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बीजापुर: नक्सली असर से मुक्त होकर 76 स्कूलों में फिर गूंजेगी बच्चों की आवाज, शिक्षकों की हुई तैनाती

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छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले में शिक्षा का उजाला एक बार फिर लौट आया है। आज यानी सोमवार से जिले में शैक्षणिक सत्र 2025-26 की औपचारिक शुरुआत हो गई है। जिले के कुल 969 स्कूलों में बच्चों की चहचहाहट फिर से सुनाई देने लगी है। शिक्षा विभाग ने स्कूलों को नए सिरे से रंग-रोगन कर सजाया है और साफ-सफाई के साथ बच्चों के स्वागत के लिए सभी तैयारियां पूरी कर ली हैं।

वर्षों से बंद 76 स्कूलों में बहाल हुई पढ़ाई

नक्सलियों के डर से बंद पड़े 76 स्कूलों में इस बार नियमित शिक्षकों की नियुक्ति कर दी गई है। गुंडापुर, मुदवेंडी, हिरमगुंडा, मुरकीपाड़, जीड़पल्ली और गुन्जेपरती जैसे दूरस्थ व संवेदनशील इलाकों में भी शिक्षकों की पोस्टिंग हो चुकी है। लगभग दो दशक बाद इन इलाकों में शिक्षा की लौ फिर से जली है।

बच्चों का पारंपरिक स्वागत, मिलेगा स्कूल बैग और किताबें

इस सत्र में करीब 6000 नए बच्चों का नामांकन संभावित है। इन नवप्रवेशी विद्यार्थियों का तिलक लगाकर और मिठाई खिलाकर स्वागत किया जा रहा है। साथ ही उन्हें स्कूल बैग और पाठ्यपुस्तकें भी वितरित की जा रही हैं।

63368 छात्र सरकारी स्कूलों में कर रहे पढ़ाई

जिले के कुल 962 स्कूलों में इस समय लगभग 63368 छात्र-छात्राएं पढ़ाई कर रहे हैं, जिनमें 740 प्राथमिक, 158 माध्यमिक, 34 हाईस्कूल और 30 हायर सेकेंडरी स्कूल शामिल हैं।

युक्तियुक्तकरण के बाद अब कोई स्कूल शिक्षकविहीन नहीं

शिक्षा विभाग ने युक्तियुक्तकरण की प्रक्रिया के तहत जिले के 78 स्कूलों में शिक्षकों की पदस्थापना की है। इसके चलते अब ऐसा कोई स्कूल नहीं बचा है जहां शिक्षक न हो। एक हाई स्कूल में सभी रिक्त व्याख्याता पद भी भर दिए गए हैं।

स्वागत के लिए स्कूलों में विशेष सजावट

स्कूलों में छात्रों के स्वागत के लिए रंग-बिरंगे पोस्टर, झंडे और स्वागत द्वार बनाए गए हैं। कुछ स्कूलों में तो बच्चों और शिक्षकों ने मिलकर पूरा परिसर सजाया है, जिससे स्कूलों में उत्सव जैसा माहौल बन गया है।

शिक्षकों को समय पर पहुंचने और आत्मीयता से पढ़ाने के निर्देश

जिला शिक्षा अधिकारी ने सभी शिक्षकों को निर्देशित किया है कि वे समय पर स्कूल पहुंचे और खासतौर पर छोटे बच्चों का आत्मीय स्वागत करें। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल औपचारिक प्रक्रिया न होकर, बच्चों से जुड़ाव और संवाद पर आधारित होनी चाहिए।

“हर बच्चा देश का भविष्य निर्माता है,” यह कहते हुए जिला शिक्षा अधिकारी एलएल धनेलिया ने भरोसा जताया कि इस नए सत्र में बच्चों को बेहतर शिक्षा और एक सकारात्मक वातावरण देने का हर संभव प्रयास किया जाएगा।

प्रसूता साक्षी निषाद की मौत ने उठाए स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल, इलाज में लापरवाही से टूटा एक परिवार

पहली बार मां बनी साक्षी निषाद की जिंदगी अपनी नवजात बच्ची का नाम रखने से पहले ही खत्म हो गई। इस दर्दनाक घटना ने न केवल एक परिवार को गहरा सदमा दिया है, बल्कि छत्तीसगढ़ की चरमराई स्वास्थ्य व्यवस्था को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है।

बिरगांव की रहने वाली साक्षी ने 9 जून को दोपहर करीब 2 बजे एक बच्ची को जन्म दिया। घर में नई ज़िंदगी के आगमन से खुशी की लहर दौड़ गई थी। लेकिन उसी रात खुशियों का यह माहौल मातम में बदल गया।

करीब रात 2 बजे साक्षी को तेज पेट दर्द शुरू हुआ। परिवार वालों ने तुरंत अस्पताल के कर्मचारियों को सूचित किया। नर्स ने आकर एक इंजेक्शन लगाया और बिना ज्यादा ध्यान दिए वापस लौट गई। दर्द कम नहीं हुआ और जब परिजनों ने दोबारा मदद मांगी तो उन्हें झिड़क दिया गया कि “बार-बार परेशान मत करो”, और स्टाफ ने दरवाजा बंद कर लिया।

साक्षी की हालत लगातार बिगड़ती गई। शरीर अकड़ गया और वह बेहोश हो गई। तब जाकर गंभीर स्थिति में उसे बिरगांव शहरी स्वास्थ्य केंद्र से रायपुर के मेकाहारा अस्पताल रेफर किया गया। परिजनों के मुताबिक, उस वक्त स्वास्थ्य केंद्र की प्रभारी डॉक्टर अंजना ड्यूटी पर मौजूद नहीं थीं।

साक्षी को किसी तरह मेकाहारा ले जाया गया, लेकिन वहां पहुंचने तक काफी देर हो चुकी थी और उसे बचाया नहीं जा सका।

परिजन बोले – “लापरवाही से गई जान, अब तक कोई जिम्मेदार नहीं”

मृतका के पति दीपक निषाद और अन्य परिजनों का कहना है कि अस्पताल की घोर लापरवाही साक्षी की मौत का कारण बनी। उन्होंने बताया कि अब तक केवल सांत्वना और आश्वासन मिल रहे हैं, कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।

CMHO डॉ. मितलेश चौधरी ने तीन दिन के भीतर जांच कर आवश्यक कदम उठाने का भरोसा दिलाया था, लेकिन पांच दिन बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस है।

सिस्टम की विफलता की एक और मिसाल

यह मामला छत्तीसगढ़ में बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं का अकेला उदाहरण नहीं है। आए दिन सरकारी अस्पतालों से इस तरह की लापरवाही की खबरें आती रहती हैं, जिससे आम जनता का भरोसा डगमगा चुका है।उठते हैं अहम सवाल:

ड्यूटी पर तैनात नर्स बॉय पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?

जब मरीज की हालत बिगड़ रही थी, तो तुरंत प्राथमिक इलाज क्यों नहीं किया गया?

क्या अस्पताल कर्मियों की कोई जवाबदेही नहीं है?

कब तक लापरवाही से मौतें होती रहेंगी और सरकार आश्वासन देती रहेगी?

छत्तीसगढ़ सरकार को इस मामले में संवेदनशीलता दिखाते हुए दोषियों के खिलाफ त्वरित और सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। यह सिर्फ एक महिला की मौत नहीं, बल्कि एक नाकाम स्वास्थ्य तंत्र का खौफनाक उदाहरण है।

OTP नहीं आया तो राशन नहीं: ग्रामीणों के लिए बना सिरदर्द, सरकार से व्यवस्था बदलने की मांग

रायपुर। छत्तीसगढ़ में सरकार द्वारा राशन वितरण के लिए ओटीपी (वन टाइम पासवर्ड) अनिवार्य करने का निर्णय ग्रामीणों और शहरी गरीबों के लिए बड़ी मुसीबत बनता जा रहा है। नेटवर्क की समस्या और तकनीकी बाधाओं के चलते लोगों को हफ्तों तक राशन के लिए इंतजार करना पड़ रहा है।

ग्रामीण अंचलों में मोबाइल नेटवर्क की स्थिति बेहद खराब है। कई इलाकों में घंटों तक नेटवर्क गायब रहता है, जिससे ओटीपी समय पर नहीं पहुंच पाता। इसका खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ रहा है जो पूरी तरह से सरकारी राशन पर निर्भर हैं।

दिनभर राशन दुकानों के बाहर इंतजार

ग्रामीणों का कहना है कि वे झोला लेकर सुबह से शाम तक राशन दुकानों के बाहर बैठे रहते हैं, लेकिन ओटीपी न आने के कारण उन्हें राशन नहीं मिल पाता। कुछ लोगों को चार-चार दिन बाद नंबर आया, तब जाकर अनाज मिल पाया।

दुकानदारों का भी कहना है कि पहले फिंगरप्रिंट सिस्टम से रोज़ 30 से 40 लोगों को आसानी से राशन मिल जाता था, लेकिन अब मुश्किल से 4-5 उपभोक्ताओं को ही रोज राशन मिल पा रहा है।

फिंगरप्रिंट सिस्टम को फिर से शुरू करने की मांग

लोगों की मांग है कि सरकार पुराने फिंगरप्रिंट सिस्टम को पुनः लागू करे या फिर ओटीपी के साथ-साथ फिंगरप्रिंट को भी वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में मान्यता दे। इससे अधिक उपभोक्ताओं को समय पर राशन मिल सकेगा और कोई भूखा नहीं रहेगा।

8 महीने से नहीं मिला मिट्टी तेल

एक अन्य गंभीर समस्या यह भी है कि पिछले आठ महीनों से राशन दुकानों पर केरोसिन (मिट्टी तेल) की आपूर्ति पूरी तरह से बंद है। गांवों में अभी भी बड़ी संख्या में लोग मिट्टी तेल पर निर्भर हैं। ऐसे में शासन को इस दिशा में भी तत्काल पहल करनी चाहिए।

जनता की अपील

ग्रामीणों और राशन दुकानदारों ने सरकार से गुहार लगाई है कि ओटीपी आधारित सिस्टम को फिर से विचाराधीन लिया जाए और ऐसी व्यवस्था लागू की जाए जो तकनीकी रूप से सभी के लिए सुगम और व्यावहारिक हो।

हिरासत में युवक की मौत: हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, मां को 2 लाख मुआवजा और 9% ब्याज देने का आदेश

कोरबा जिले के एक मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हिरासत में एक युवक की संदिग्ध मौत को गंभीरता से लेते हुए इसे संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) का उल्लंघन माना है। अदालत ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि मृतक सूरज हथेल की मां को 2 लाख रुपये का मुआवजा 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित आठ सप्ताह के भीतर दिया जाए।

कोरबा पुलिस हिरासत में हुई थी मौत

मामला 20 जुलाई 2024 का है, जब कोरबा के दर्री इलाके के 27 वर्षीय सूरज हथेल को पुलिस ने कुछ धाराओं के तहत गिरफ्तार किया था। उसी दिन सुबह उसकी तबीयत बिगड़ी और उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। मृतक के परिजनों ने आरोप लगाया कि पुलिस की मारपीट के कारण उसकी जान गई।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कई चोटों की पुष्टि

सूरज की मां प्रेमा हथेल ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर मुआवजे की मांग की थी। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि यह हिरासत में हुई मौत का मामला है, और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतक के शरीर पर कई चोटें व हड्डियों में फ्रैक्चर होने की पुष्टि हुई है। भले ही न्यायिक जांच में मौत का कारण दिल से जुड़ी बीमारी (मायोकार्डियल इंफेक्शन) बताया गया हो, लेकिन शरीर पर पाए गए चोटों के निशान संदेह पैदा करते हैं।

कोर्ट ने माना पुलिस की पिटाई से हुई मौत

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बीडी गुरु की खंडपीठ ने सभी तथ्यों और प्रमाणों का अध्ययन करने के बाद माना कि सूरज की मौत हिरासत में पिटाई के कारण हुई। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो राज्य पर मुआवजा देने की जिम्मेदारी बनती है। उन्होंने मृतक की मां को हर्जाने का पात्र मानते हुए राहत प्रदान की।

सिलतरा-साकरा सर्विस रोड पर भारी वाहनों की एंट्री पर रोक, ग्रामीणों को राहत

सिलतरा-साकरा सर्विस रोड पर अब भारी वाहन नहीं दौड़ सकेंगे। प्रशासन ने आखिरकार इस मार्ग पर भारी वाहनों की आवाजाही रोकने के लिए बेरिकेड्स लगा दिए हैं। इस फैसले से क्षेत्र के ग्रामीणों को बड़ी राहत मिली है, क्योंकि लंबे समय से वे हादसों के डर में जी रहे थे और बार-बार प्रशासन से इस मांग को लेकर प्रदर्शन करते आ रहे थे।

ग्रामीणों का कहना है कि यह सर्विस रोड केवल 15 फीट चौड़ी है और यहां चौबीसों घंटे भारी वाहनों की आवाजाही बनी रहती थी, जिससे आए दिन दुर्घटनाएं होती थीं। सिलतरा और साकरा बस्ती में आने-जाने के लिए ग्रामीणों को मुख्य सिक्स लेन हाईवे से 1 किलोमीटर आगे जाकर यू-टर्न लेना पड़ता है, जिससे जोखिम और बढ़ जाता था।

सिलतरा औद्योगिक क्षेत्र में लगभग 200 छोटे-बड़े उद्योग संचालित हैं, जिनके ट्रक और भारी वाहन इसी संकरी सर्विस रोड से गुजरते थे। इससे जाम की समस्या भी आम हो गई थी। इसी कारण से ग्रामीण लम्बे समय से इस मार्ग पर भारी वाहनों की एंट्री बंद करने और एक अंडरब्रिज की मांग करते आ रहे हैं।

ग्रामीणों के अनुसार, वे वर्ष 2020 से लगातार अंडरब्रिज निर्माण और ट्रक ट्रैफिक पर रोक की मांग कर रहे थे। साकरा, सोंडरा, धनेली, निमोरा, मुरेठी और सिलतरा गांवों के लोगों ने सांसद बृजमोहन अग्रवाल से भी इस मुद्दे पर हस्तक्षेप की अपील की थी। अब जाकर प्रशासन की पहल से उन्हें कुछ राहत मिली है, हालांकि अंडरब्रिज जैसी स्थायी समाधान की दिशा में अभी कदम उठाया जाना बाकी है।

केदारनाथ के पास बड़ा हादसा: हेलिकॉप्टर क्रैश में पायलट समेत 7 लोगों की मौत, मासूम बच्चा भी शामिल

उत्तराखंड के केदारनाथ क्षेत्र में एक दर्दनाक हादसा सामने आया है। मंगलवार सुबह करीब 5:30 बजे गौरीकुंड के पास एक हेलिकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस हादसे में पायलट समेत कुल सात लोगों की जान चली गई। मृतकों में एक 23 महीने का बच्चा भी शामिल है।

हेलिकॉप्टर आर्यन एविएशन कंपनी का था और यह गौरी माई खर्क इलाके में जंगल के ऊपर क्रैश हुआ। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, खराब मौसम को हादसे की मुख्य वजह माना जा रहा है।

ग्रामीण महिलाओं ने दी जानकारी

घटनास्थल के पास घास काट रही नेपाली मूल की महिलाओं ने सबसे पहले क्रैश की जानकारी दी। इसके बाद प्रशासन हरकत में आया। हेलिकॉप्टर नोडल अधिकारी राहुल चौबे और जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी नंदन सिंह रजवार ने हादसे की पुष्टि की है। राहत और बचाव कार्य में SDRF व NDRF की टीमें मौके पर पहुंच गई हैं।

मृतकों में महाराष्ट्र, उत्तराखंड, यूपी और गुजरात के लोग

जान गंवाने वालों में महाराष्ट्र के जयसवाल परिवार के तीन सदस्य – राजकुमार जयसवाल, श्रद्धा जयसवाल और उनका बच्चा काशी जयसवाल शामिल हैं। इसके अलावा तुष्टि सिंह, विनोद नेगी, बीकेटीसी कर्मचारी विक्रम सिंह रावत और पायलट कैप्टन राजीव भी इस हादसे का शिकार हो गए।

मुख्यमंत्री ने जताया शोक

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने घटना पर गहरा शोक व्यक्त किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर लिखा, “रुद्रप्रयाग जिले में हुए हेलिकॉप्टर हादसे की खबर अत्यंत दुखद है। राहत एवं बचाव कार्य तेजी से जारी है। मैं बाबा केदारनाथ से दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए प्रार्थना करता हूं।”

कुछ दिन पहले भी हुआ था हादसा

गौरतलब है कि इससे पहले 7 जून को भी केदारनाथ क्षेत्र में एक हेलिकॉप्टर तकनीकी खराबी के चलते सड़क पर आपातकालीन रूप से उतारना पड़ा था। उस वक्त सभी यात्री और पायलट सुरक्षित बचा लिए गए थे।

यह ताजा हादसा एक बार फिर श्रद्धालुओं की सुरक्षा व्यवस्था और मौसम की गंभीरता को लेकर बड़ेसवाल खड़े करता है।

केंद्र के दबाव में ईडी की कार्रवाई, सुकमा कांग्रेस भवन अटैच करने पर भड़के पीसीसी चीफ दीपक बैज

छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने सुकमा स्थित राजीव भवन को अटैच किए जाने को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) अब भाजपा के सहायक संगठन की तरह काम कर रही है और यह कार्रवाई सीधे तौर पर केंद्र के इशारे पर की गई है।

बैज ने बताया कि सुकमा में बने कांग्रेस दफ्तर से जुड़ी सारी वित्तीय जानकारी पहले ही ईडी को सौंप दी गई थी, इसके बावजूद यह कदम उठाया गया। उन्होंने इसे लोकतंत्र पर सीधा हमला करार दिया। इस कार्रवाई के विरोध में कांग्रेस ने शनिवार को प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों पर ईडी के खिलाफ पुतला दहन और विरोध प्रदर्शन किया।

रायगढ़ में मकान तोड़े जाने पर भी बैज ने जताया विरोध

दीपक बैज ने रायगढ़ में गरीबों के मकानों को तोड़े जाने की कार्रवाई को भी अमानवीय बताया। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार के एक मंत्री के इशारे पर 300 से अधिक गरीब परिवारों के आशियाने उजाड़ दिए गए। उन्होंने इस कदम को गरीब विरोधी करार देते हुए कहा कि यदि विकास गरीबों की कीमत पर होता है, तो वह विकास नहीं बल्कि विनाश है। कांग्रेस ने इस पूरे मामले की जांच के लिए एक समिति का गठन भी किया है।

शिक्षा व्यवस्था के युक्तियुक्तकरण पर भी उठाए सवाल

पीसीसी चीफ ने राज्य में शिक्षा विभाग की नीतियों को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि 10,463 स्कूलों को जबरन बंद कर दिया गया है और नए सेटअप के नाम पर हजारों प्राथमिक, मिडिल, हाईस्कूल और हायर सेकेंडरी स्कूलों से शिक्षकों के 45,000 पद खत्म कर दिए गए हैं।

दीपक बैज ने आरोप लगाया कि छात्र-शिक्षक अनुपात में वृद्धि कर दी गई है, रसोइयों और सफाई कर्मचारियों की छंटनी हो रही है। शिक्षकों पर मनमाने ढंग से दबाव बनाया जा रहा है, न कोई अतिशेष सूची जारी की गई है, न कोई ठोस आधार। उन्होंने इसे शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद करने की जिद बताया।

कांग्रेस ने सरकार की नीतियों को बताया जनविरोधी

दीपक बैज ने साफ कहा कि भाजपा सरकार के ये फैसले जनता विरोधी हैं और कांग्रेस इनका हर स्तर पर विरोध करती रहेगी।

DAP की किल्लत से किसानों की बढ़ी चिंता, NPK भी नहीं मिल पा रहा, मंत्री दे चुके हैं सप्लाई बढ़ाने के निर्देश

छत्तीसगढ़ में मानसून की आमद और शुरुआती बारिश के बाद किसानों ने खेतों में बुआई का काम शुरू कर दिया है। मगर इस बार खेती की शुरुआत में ही किसानों को खाद की भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। धान की बुआई के बाद खेतों में खाद डालने के लिए किसान सहकारी समितियों के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन वहां उनकी जरूरत की डीएपी (डायमोनियम फॉस्फेट) खाद उपलब्ध नहीं है।

किसानों की मांग पर उन्हें एनपीके (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटेशियम) खाद दी जा रही है, लेकिन कई जगहों पर यह भी उपलब्ध नहीं है। दुर्ग, बालोद, महासमुंद, धमतरी, कांकेर, बिलासपुर, कोरबा और जांजगीर-चांपा जैसे जिलों से खाद की कमी की शिकायतें मिल रही हैं।

अधिकारियों ने मानी DAP की कमी

सहकारी समितियों के अधिकारी भी स्वीकार कर रहे हैं कि डीएपी की आपूर्ति कम है। उन्होंने विकल्प के तौर पर एनपीके देने की बात कही, लेकिन कई समितियों में एनपीके भी खत्म हो चुका है।

महासमुंद जिले में बड़ी जरूरत

महासमुंद जिले में इस खरीफ सीजन में लगभग 1.62 लाख किसान 2.47 लाख हेक्टेयर में धान की खेती कर रहे हैं। इसके लिए कुल 66 हजार टन खाद की जरूरत है, लेकिन अभी तक सिर्फ 15 हजार टन खाद का भंडारण हो पाया है। शेष 51 हजार टन खाद की आपूर्ति अब तक नहीं हुई है।

मंत्री ने दिए थे आवश्यक निर्देश

राज्य के खाद्य मंत्री दयालदास बघेल ने पिछले महीने मंत्रालय में हुई समीक्षा बैठक में अधिकारियों को निर्देश दिए थे कि किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराई जाए और किसी भी समिति में खाद की कमी न हो। इसके बावजूद जमीन पर स्थिति बदहाल बनी हुई है।

महंगे दामों पर खरीदने को मजबूर किसान

खाद की कमी से किसान परेशान हैं। उनका कहना है कि डीएपी की सबसे अधिक जरूरत होती है, लेकिन समय पर खाद न मिलने से फसल को नुकसान हो सकता है। यदि वे बाजार से खाद खरीदते हैं, तो उसे सरकारी मूल्य से 400 से 500 रुपए अधिक चुकाने पड़ते हैं।

पेशी से नदारद डॉक्टरों पर गिरी कोर्ट की गाज: 100 से ज्यादा के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट, जानिए क्यों?

रायपुर के आंबेडकर अस्पताल के डॉक्टरों को इलाज, सर्जरी, पोस्टमार्टम और मेडिकल रिपोर्ट्स की व्यस्तताओं के बीच अब कोर्ट की पेशी भी भारी पड़ने लगी है। हालात ये हैं कि 100 से अधिक डॉक्टरों के खिलाफ अदालतों ने गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिए हैं। यह कार्रवाई किसी अपराध की वजह से नहीं, बल्कि बार-बार समन मिलने के बावजूद कोर्ट में पेश न होने पर की गई है।

डॉक्टरों को पेशी से राहत नहीं

एमएलसी (मेडिको लीगल केस) से जुड़े मामलों में डॉक्टरों को जांच, इलाज, पोस्टमार्टम और मुलाहिजा करने के बाद कोर्ट में बतौर गवाह पेश होना जरूरी होता है। कई डॉक्टर पेशी में न पहुंचने की वजह ओपीडी, ऑपरेशन और इमरजेंसी ड्यूटी बताते हैं। लेकिन जब दो बार समन के बावजूद पेश नहीं होते तो तीसरी बार अदालत गैर-जमानती वारंट जारी कर देती है।

वीडियोकॉन्फ्रेंसिंग बनी सहारा

अब कुछ मामलों में डॉक्टरों को वीडियो कॉल या वीडियोकॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश किया जा रहा है, जिससे उनकी परेशानी थोड़ी कम हुई है। हालांकि, पुराने मामलों में कई डॉक्टरों को अब भी भोपाल, इंदौर, रीवा, जबलपुर जैसे शहरों की अदालतों में जाना पड़ रहा है—even रिटायरमेंट या ट्रांसफर के बाद भी।

महिला डॉक्टर भी अपवाद नहीं

गिरफ्तारी वारंट के मामलों में महिला डॉक्टरों को भी कोई विशेष छूट नहीं दी जा रही। अदालत का कहना है कि डॉक्टरों के बयान केस की दिशा तय करते हैं और उनके बिना न्याय प्रक्रिया अधूरी रह जाती है।

हर विभाग की मुश्किलें

मेडिकल कॉलेज और आंबेडकर अस्पताल के लगभग हर क्लिनिकल विभाग—जैसे मेडिसिन, सर्जरी, ऑर्थो, न्यूरो, ईएनटी, पीडियाट्रिक सर्जरी और रेडियोलॉजी—के डॉक्टर कभी न कभी इस स्थिति का सामना कर चुके हैं। केवल नॉन-क्लीनिकल विभाग इससे अछूते हैं।

टॉप एक्सपर्ट की राय

डॉ. आरके सिंह, जो पूर्व डीएमई और फोरेंसिक मेडिसिन विशेषज्ञ हैं, का कहना है कि डॉक्टर एमएलसी केस में सबसे अहम गवाह होते हैं। उनके बयान और रिपोर्ट पर ही केस की आगे की कार्यवाही निर्भर करती है। पेशी में देरी केस को लंबित कर देती है।

इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि चिकित्सा और न्याय व्यवस्था के बीच सामंजस्य की जरूरत है, ताकि डॉक्टर अपने कर्तव्यों का पालन भी कर सकें और न्याय में भी सहयोग दे सकें।

फर्जी दस्तावेज़ों से पासपोर्ट, फिर सीमा पार – बांग्लादेशी दंपति की चालबाजी से हक्का-बक्का सुरक्षा एजेंसियां

राजधानी रायपुर में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों का खुलासा प्रदेश की खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक गंभीर चेतावनी बनकर सामने आया है। हाल ही में सामने आए एक मामले में मोहम्मद दिलावर नाम के व्यक्ति ने न केवल फर्जी दस्तावेजों के जरिए भारतीय पासपोर्ट हासिल कर लिया, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में वह चार बार बांग्लादेश आना-जाना भी कर चुका है – और किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी।

दिलावर ने 2015 में रायपुर से पासपोर्ट बनवाया था, जो पुलिस सत्यापन की प्रक्रिया के बाद ही जारी हुआ होगा। इस पूरे मामले में पुलिस के खुफिया तंत्र और दस्तावेज सत्यापन प्रणाली की कमजोरियां उजागर हो गई हैं। यह सवाल खड़ा हो रहा है कि आखिर विदेशी नागरिक कैसे इतनी आसानी से भारतीय दस्तावेज बनवा लेते हैं।

परिवार समेत अवैध रूप से रह रहा था

पुलिस ने दिलावर, उसकी पत्नी और बेटी के खिलाफ अवैध प्रवास और जालसाजी के तहत केस दर्ज कर लिया है। तीनों को वापस बांग्लादेश भेजने की तैयारी चल रही है और इसके लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

जालसाजी का मास्टरमाइंड अब भी फरार

इससे पहले फरवरी 2025 में, एटीएस ने रायपुर के टिकरापारा क्षेत्र से तीन बांग्लादेशी युवकों को पकड़ा था – मोहम्मद इस्माइल, शेख अकबर और शेख साजन। ये सभी मिश्रा बाड़ा ताजनगर इलाके में रह रहे थे। इन युवकों को पासपोर्ट बनवाकर विदेश भेजने वाला मुख्य साजिशकर्ता अब तक पुलिस की पकड़ से बाहर है। दिलावर के फर्जी दस्तावेज बनवाने वालों का भी अभी तक कोई सुराग नहीं मिल पाया है।

एजेंटों का सक्रिय नेटवर्क

इस पूरे प्रकरण ने यह भी उजागर किया है कि बांग्लादेशियों को भारत लाकर बसाने के लिए एक सक्रिय नेटवर्क काम कर रहा है। ये एजेंट सबसे पहले बांग्लादेशी नागरिकों को पश्चिम बंगाल के रास्ते भारत लाते हैं, फिर उन्हें महाराष्ट्र के नागपुर या मुंबई में कुछ समय रखकर बाद में छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भेज देते हैं। यहां ये किराए के मकानों में रहते हैं और छोटे-मोटे काम करते हैं। इसके बाद स्थानीय एजेंट उनकी फर्जी पहचान बनाने में मदद करते हैं – जैसे स्कूल की अंकसूची, आधार कार्ड, और पासपोर्ट।

प्रशासन और पुलिस पर सवाल

इस घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारी सुरक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर है कि विदेशी नागरिक फर्जी दस्तावेजों के बल पर यहां रह भी सकते हैं और आवाजाही भी कर सकते हैं? मामले की गहराई से जांच और ऐसे नेटवर्क पर जल्द से जल्द लगाम लगाने की आवश्यकता है।