छत्तीसगढ़ सरकार राज्य में बढ़ते धर्मांतरण के मामलों पर अंकुश लगाने के लिए एक नया कानून लाने की तैयारी में है। बीते पांच वर्षों में राज्य में धर्मांतरण के कुल 23 मामले दर्ज किए गए हैं, जिनमें से अधिकतर घटनाएं बस्तर और सरगुजा जैसे आदिवासी बहुल इलाकों से सामने आई हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020 में 1 मामला, 2021 में 7, 2022 में 3, 2023 में कोई मामला नहीं, जबकि 2024 में अब तक 12 मामले और इस वर्ष अब तक 4 नए केस दर्ज किए गए हैं।
अब तक नहीं है कोई विशेष कानून
राज्य में फिलहाल धर्मांतरण को नियंत्रित करने के लिए कोई विशेष कानून मौजूद नहीं है। लगातार मिल रही शिकायतों को देखते हुए राज्य सरकार ने अब ‘धर्म स्वातंत्र्य संशोधन विधेयक’ लाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। बताया जा रहा है कि विधेयक का मसौदा देश के अन्य 10 राज्यों के कानूनों की समीक्षा के बाद तैयार किया जा रहा है।
एनजीओ के जरिए हो रहा धर्मांतरण?
धर्मांतरण की घटनाएं खासकर चंगाई सभा और सेवा कार्यों के नाम पर सामने आ रही हैं। गरीब, अशिक्षित और कमजोर तबके के लोगों को स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाएं देने का लालच देकर धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है। इसके लिए कुछ गैर-सरकारी संगठनों को गुप्त रूप से विदेशी फंडिंग भी की जा रही है।
वर्ष 2020 में कानून में संशोधन के बाद ऐसे 84 एनजीओ पर कार्रवाई की गई थी, जबकि 127 स्वयं बंद हो गए। वर्तमान में 153 एनजीओ विदेशी फंडिंग के साथ राज्य में काम कर रहे हैं। बस्तर में पंजीकृत 19 एनजीओ में से 9 और जशपुर में 18 में से 15 संस्थाएं कथित रूप से ईसाई मिशनरियों से जुड़ी बताई जा रही हैं।
सरकार की सख्ती, कानून जल्द
राज्य के उपमुख्यमंत्री और गृहमंत्री विजय शर्मा ने कहा है कि धर्मांतरण के मामलों को रोकने के लिए पुलिस और प्रशासन गंभीरता से काम कर रहा है। साथ ही सरकार नए और सख्त प्रावधानों के साथ एक विधेयक लाने की दिशा में अग्रसर है। उन्होंने कहा, “हम जल्द ही विधानसभा में विधेयक प्रस्तुत करेंगे और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।”
निष्कर्ष:
छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण की घटनाएं चिंता का विषय बनी हुई हैं। सरकार जहां अब इस पर कानून बनाकर कार्रवाई के मूड में है, वहीं सामाजिक संगठन इस पर दो धड़े में बंटे नजर आ रहे हैं। आने वाले समय में इस पर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो सकती है