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जानें क्या है ये दुर्लभ बीमारी, 1 लाख में से सिर्फ 5 लोग बनते हैं शिकार

Progressive Supranuclear Palsy के लक्षण पार्किंसन बीमारी जैसे ही होते हैं, लेकिन ये बीमारी पार्किंसन से बेहद अलग होती है।

Progressive Supranuclear Palsy। नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड की पत्नी सीता दहल का बुधवार को Progressive Supranuclear Palsy (PSP) नामक दुर्लभ बीमारी से निधन हो गया। Progressive Supranuclear Palsy एक दुर्लभ बीमारी है, जिससे सीता दहल लंबे समय से पीड़ित चल रही थी। अब तक हुई रिसर्च के मुताबिक Progressive Supranuclear Palsy बीमारी एक लाख लोगों में से सिर्फ 5 या 6 लोगों को शिकार बनाती है।

जानें क्या है Progressive Supranuclear Palsy

PSP के लक्षण पार्किंसन बीमारी जैसे ही होते हैं, लेकिन ये बीमारी पार्किंसन से बेहद अलग होती है। इस बीमारी से पीड़ित मरीज की मौत 6 से 9 साल के दरमियान हो जाती है। मरीजों में निमोनिया होने का खतरा लगातार बना रहता है और घातक स्तर तक पहुंच जाता है। यहीं कारण है कि प्रोग्रेसिव सुप्रान्यूक्लीयर पाल्सी (पीएसपी) को एक दुर्लभ और क्रोनिक न्यूरोडीजेनेरेटिव विकार माना जाता है, जो मस्तिष्क के कुछ क्षेत्रों को नुकसान पहुंचाता है।
मरीज पर क्या असर होता है
PSP होने पर मरीज की चलने, सोचने, निगलने और आँखों को हिलाने की क्षमता भी प्रभावित होने लगती है। पार्किंसंस रोग जैसे लक्षण दिखने के कारण पहले इस रोग को पार्किंसंस ही माना जाता है लेकिन काफी शोध के बाद इस बीमारी के बारे में पता चला। यह स्थिति आमतौर पर 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को प्रभावित करती है। यह 40 वर्ष की आयु से पहले बहुत कम विकसित होती है।

चार प्रकार का होता है PSP

PSP जैसी दुर्लभ बीमारी भी 4 अलग-अलग प्रकार की होती है, इन सभी प्रकारों में कुछ 4 अनोखे अंतर भी होते हैं। दो सबसे आम प्रकार रिचर्डसन सिंड्रोम और पीडी-लाइक वेरिएंट (पीएसपी-पी) हैं, जिसका अर्थ है पार्किंसंस रोग जैसा वेरिएंट।

PSP बीमारी में दिखते हैं ये लक्षण

इस बीमारी से पीड़ित मरीज को चलने और संतुलन की समस्या, बोलने में परेशानी, याददाश्त और सोच संबंधी समस्याएं और आंखों पर नियंत्रण में कठिनाई आने लगती है।

PSP का इलाज

Progressive Supranuclear Palsy होने पर आमतौर पर मौखिक दवाएं दी जाती है। इसके अलावा आंखों के भी उपचार किया जाता है। परक्यूटीनियस एंडोस्कोपिक गैस्ट्रोस्टॉमी के जरिए रोग की गंभीरता के बारे में पता किया जाता है।