बडी खबर : सहकारी बैंक और सहकारी समितियों में चुनाव नही अब राज्य सरकार अपने पसंदीदा लोगों का करेगी मनोनयन : लंबे अरसे से चली आ रही चुनाव परंपरा और नियमों में राज्य सरकार ने किया बड़ा बदलाव…

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रायपुर, सहकारिता की राजनीति करने वाले किसान नेताओं को राज्य सरकार ने एक झटके में बाहर का रास्ता दिखा दिया है। गांव में किसानों के बीच अच्छी पकड़ और पैठ रखने वाले किसान नेताओं के लिए जिला सहकारी केंद्रीय बैंक और सहकारी समितियों में राजनीति करना सपना हो जाएगा। राज्य शासन ने नियमों में बड़ा बदलाव कर दिया है। अब चुनाव के बाद मनोनय की राजनीति चलेगा। इसके जरिए राज्य सरकार के नुमाइंदे अपनी पसंद के चेहरों को बैंक के महत्वपूर्ण पदों पर बैठा देंगे। अपनी मर्जी के अनुसार सहकारिता की राजनीति चलाएंगे।

सहकारी बैंक और सहकारी समितियों में चुनाव प्रक्रिया को लेकर लंबे अरसे से चली आ रही परंपरा और नियमों में राज्य सरकार ने बड़ा बदलाव कर दिया है। बदलाव ऐसा कि अब चुनाव की प्रक्रिया सहकारिता के क्षेत्र में नहीं होगी। किसानों को चुनाव लड़ने का अवसर ही नहीं मिलेगा। सरकार जिसे चाहेगी बैंक के महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी सौंप देगी। सहकारिता के क्षेत्र में राजनीतिक करने वाले किसानों को चुनाव का इंतजार रहता था। चुनाव के जरिए बैंक का संचालन के कारण किसानों में बैंक का सदस्य बनने का आकर्षण भी बने रहता था।

अधिकांश किसान इसलिए सहकारी बैंक व समितियों के सदस्य बने रहते थे कि चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने का मौका मिलता था। चुनाव नहीं लड़ते थे तो अपनी मनपंसद के उम्मीदवार को चुनाव जीताकर बैंक में काबिज करा देते थे। अब जबकि समितियों में चुनाव की प्रक्रिया ही नहीं होगी माना जा रहा है कि बैंक के सदस्य बनने का किसानों में आकर्षण भी खत्म हो जाएगा। वैसे भी प्रदेश के जिला सहकारी केंद्रीय बैंक में राज्य सरकार ने अध्यक्षों का मनोनयन पहले ही कर दिया है। नियमों में संशोधन के बाद माना जा रहा है कि कुछ अध्यक्षों को रिपीट कर दिया जाएगा। कुछ चेहरे बदल जाएंगे। यह सब राज्य सरकार की प्राथमिकता और मापदंड पर तय करेगा कि किस अध्यक्ष की कुर्सी रहेगी और कितने की जाएगी।