टीएस सिंहदेव बनाम भूपेश बघेल: क्या छत्तीसगढ़ कांग्रेस में सब कुछ ठीक है?

864

छत्तीसगढ़ सरकार के वरिष्ठ मंत्री टीएस सिंहदेव के इस्तीफ़े के बाद अब छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस पार्टी का विवाद सतह पर आ गया है. ये इस्तीफ़ा ऐसे समय में हुआ है, जब राज्य में सवा साल बाद विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं.

छत्तीसगढ़ में ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री का फ़ॉर्मूला लागू नहीं होने के बाद, इस इस्तीफ़े को टीएस सिंहदेव की इसी नाराज़गी से जोड़ कर देखा जा रहा है.

राजनीतिक गलियारे में माना जा रहा है कि राज्य में एक तो ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री का फ़ॉर्मूला लागू नहीं हुआ, इसके उलट टीएस सिंहदेव को लगातार हाशिए पर डालने की कोशिश की जा रही थी.

उनके ही इलाके में बघेल समर्थक विधायकों ने सिंहदेव के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल रखा था. ऐसे कई अवसर आए, जब टीएस सिंहदेव को उनके ही विभाग की बैठकों से दूर रखा गया. इन सब की मिली-जुली प्रतिक्रिया को इस्तीफ़े से जोड़ा जा रहा है.

हालांकि राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा है कि उन्हें अब तक टीएस सिंहदेव का इस्तीफ़ा नहीं मिला है. उन्होंने सरकार के बीच तालमेल नहीं होने के आरोप से इनकार किया है.

बीजेपी को मिला मुद्दा

भूपेश बघेल ने कहा, “मुझे भी मीडिया के माध्यम से पता चला है. सब तालमेल है, जो कुछ भी बात है, आपस में बैठ कर तय कर लेंगे. जब मेरे पास पत्र आएगा तो विचार करूंगा. कल रात मैंने फोन मिलाया था, नहीं लगा.”

वहीं, टीएस सिंहदेव ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि मुझे मजबूरी में इस्तीफ़ा देना पड़ा.

सिंहदेव ने बीबीसी से कहा, “मैंने अपने इस्तीफ़े की वजह पत्र में साफ़-साफ़ लिखी है. मैंने इन मुद्दों पर मुख्यमंत्री जी को व्यक्तिगत तौर पर कई बार अनुरोध किया, उन्हें पत्र भी लिखा. लेकिन इस दिशा में कुछ नहीं हुआ. पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग में काम की परिस्थितियां प्रतिकूल थीं, इसलिए मुझे मजबूरी में इस्तीफ़ा देना पड़ा.”

टीएस सिंहदेव ने राज्य के पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग से इस्तीफ़ा दिया है. वे स्वास्थ्य मंत्रालय का कामकाज देखते रहेंगे.

इधर, टीएस सिंहदेव के इस्तीफ़े के बाद छत्तीसगढ़ में भाजपा को भी बैठे-बिठाए बड़ा मुद्दा मिल गया है. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा कि राज्य के सभी मंत्रियों की हालत एक जैसी है. मंत्रियों को काम नहीं करने दिया जा रहा है. टीएस सिंहदेव ने इस्तीफ़ा दिया है, दूसरे मंत्री चुप हैं लेकिन उनमें आक्रोश है.

रमन सिंह ने कहा, “टीएस सिंहदेव ने अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है. एक दिन ऐसा विस्फोट होगा कि महाराष्ट्र जैसी हालत हो जाएगी.”

सरकार पर गंभीर आरोप

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को भेजे चार पन्नों के अपने इस्तीफ़े में टीएस सिंहदेव ने सरकार पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं.

उन्होंने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को भेजे इस्तीफ़े में कहा है कि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत् प्रदेश के आवास विहीन लोगों को आवास बनाकर दिया जाना था जिसके लिए मैंने कई बार आपसे चर्चा कर राशि आवंटन का अनुरोध किया था किंतु इस योजना में राशि उपलब्ध नहीं की जा सकी. फलस्वरूप प्रदेश के लगभग 8 लाख लोगों के लिए आवास नहीं बनाए जा सके.

टीएस सिंहदेव ने अपने इस्तीफ़े में लिखा है कि नियम विरुद्ध मुख्यमंत्री समग्र ग्रामीण विकास योजना के अंतर्गत कार्यों की अंतिम स्वीकृति हेतु रूल्स ऑफ बिजनेस के विपरीत मुख्य सचिव की अध्यक्षता में सचिवों की एक समिति गठित की गई. कार्यों की स्वीकृति हेतु मंत्री के अनुमोदन उपरांत अंतिम निर्णय मुख्य सचिव की समिति द्वारा लिये जाने की प्रक्रिया बनाई गई जो प्रोटोकाल के विपरीत और सर्वथा अनुचित है.

मुख्यमंत्री को भेजे इस्तीफ़े में टीएस सिंहदेव ने लिखा है कि उन्होंने दो सालों तक आदिवासी इलाकों में विमर्श के बाद पंचायत एक्सटेंशन इन शेड्यूल एरिया क़ानून के नियम बनाये लेकिन उन्हें विश्वास में लिए बिना, उसमें संशोधन कर दिया गया.

सिंहदेव ने पत्र में इस बात का उल्लेख किया है कि रोजागर गारंटी में कार्यरत रोजगार सहायकों की वेतन वृद्धि का प्रस्ताव लंबे समय से लंबित है लेकिन साजिश के तहत रोजगार गारंटी का काम प्रभावित करने वाले रोजगार सहायकों से पहले हड़ताल करवाई गई, जिससे राज्य में कामकाज ठप्प हुआ और फिर उन्हें काम पर वापस ले लिया गया.

लेकिन हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध पत्र में लिखे कारणों को ही इस्तीफ़े की मुख्य वजह नहीं मानते. अविभाजित मध्य प्रदेश और अब छत्तीसगढ़ की राजनीति को क़रीब से देखने वाले दिवाकर मुक्तिबोध का कहना है कि सरकार में टीएस सिंहदेव की लगातार उपेक्षा हो रही थी.

दिवाकर मुक्तिबोध कहते हैं, “टीएस सिंहदेव जैसे वरिष्ठ मंत्री के मान-सम्मान का कभी ध्यान नहीं रखा गया. उनके इस्तीफ़े को मुखर असंतोष से जोड़ कर देखा जाना चाहिए. अफ़सोस की बात ये है कि 90 में से 71 कांग्रेस विधायकों वाले राज्य में अगले साल जब चुनाव होंगे तो ऐसे असंतोष की क़ीमत कांग्रेस पार्टी को उठानी पड़ सकती है. देश भर में कांग्रेस पार्टी का जो हाल है, उसे देखते हुए समय रहते कांग्रेस आलाकमान ने क़दम नहीं उठाए तो पार्टी के लिए मुश्किल हो सकती है.”

ढाई-ढाई साल का फ़ॉर्मूला

दिसंबर 2018 में जब राज्य में कांग्रेस पार्टी सत्ता में आई तो मुख्यमंत्री पद को लकर मामला अटल गया. कांग्रेस पार्टी के सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी के समक्ष भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव के बीच ढाई-ढाई साल के फॉर्मूले पर सहमति हुई.

राज्य में सत्ता संभालने के साथ ही ढाई-ढाई साल के फ़ॉर्मूले की बात भी सार्वजनिक हुई लेकिन भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव, इससे इनकार करते रहे. दोनों नेता, भविष्य के फ़ैसले के लिए आलाकमान का हवाला देते रहे. पिछले साल 17 जून को जब भूपेश बघेल के कार्यकाल के ढाई साल पूरे हुए, उसके साथ ही फिर नेताओं की दिल्ली दौड़ शुरू हुई.

इस बीच भूपेश बघेल के कट्टर समर्थक कांग्रेस विधायक बृहस्पति सिंह ने लगभग बीस विधायकों की उपस्थिति में सनसनीखेज तरीक़े से टीएस सिंहदेव पर अपनी हत्या करवाने की आशंका जताई. हालांकि इन आरोपों के कुछ ही घंटों बाद पार्टी विधायकों की एक बैठक मुख्यमंत्री के साथ हुई लेकिन इस बैठक में बृहस्पति सिंह ने इस संबंध में कुछ भी नहीं कहा.

इसके बाद बृहस्पति सिंह के ख़िलाफ़ राज्य के अलग-अलग हिस्सों से कांग्रेस पार्टी ने पार्टी से निकालने का प्रस्ताव पारित करना शुरू कर दिया. इधर, विधानसभा की कार्रवाई के बीच टीएस सिंहदेव ने पूरे मामले के पटाक्षेप होने तक सदन में नहीं आने की घोषणा की और सदन से निकल गए.

दूसरी ओर, दिल्ली में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं से भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव की मुलाकात होती रही और राज्य में ये चर्चा फैल गई कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को अपने पद से इस्तीफ़ा देने के लिए कह दिया गया है.

दिल्ली पहुंचने का सिलसिला

भूपेश बघेल दिल्ली से लौटे और एक दिन बाद जब वे दिल्ली पहुंचे तो कांग्रेस पार्टी के विधायकों, महापौर, पंचायत और निगम-मंडल के अध्यक्षों के दिल्ली पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया. छत्तीसगढ़ में पार्टी के प्रभारी पीएल पुनिया ने 50 से अधिक विधायकों को अपने घर दोपहर भोज पर बुला कर यह संकेत देने की कोशिश की कि वे भूपेश बघेल समर्थक विधायकों के साथ खड़े हैं.

इस दौरान विदेश दौरे से लौटीं पार्टी की नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री पद को लेकर दिलचस्पी लेनी शुरू की. असल में उत्तर प्रदेश चुनाव में प्रशिक्षण से लेकर चुनाव की तैयारी तक का पूरा काम भूपेश बघेल की टीम ही देख रही थी. ऐसे में मान लिया गया कि प्रियंका गांधी के हस्तक्षेप के बाद इस बदलाव की संभावना कम है.

भूपेश बघेल और उनके समर्थक विधायक और दूसरे नेता कई सप्ताह की जोर-आजमाइश के बाद छत्तीसगढ़ लौट आए. विपक्षी दल भाजपा इस पूरी अवधि में तंज कसती रही और राज्य में अफ़वाहों का सिलसिला पूरे साल भर जारी रहा.

वरिष्ठ पत्रकार रूद्र अवस्थी कहते हैं, “मध्य प्रदेश से लेकर पंजाब और महाराष्ट्र तक, कांग्रेस पार्टी की जो परिस्थितियां रही हैं, उनमें छत्तीसगढ़ के ढाई-ढाई साल के फॉर्मूले पर आलाकमान फ़ैसला लेने से बचता रहा. टीएस सिंहदेव फ़ैसले की प्रतीक्षा करते रहे लेकिन जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो उन्होंने मंत्री पद छोड़ कर आलाकमान को साफ़ संदेश दे दिया है कि वे ख़ुश नहीं हैं.”

हालांकि कांग्रेस पार्टी के प्रभारी पीएल पूनिया, मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव से दो दौर की बातचीत कर चुके हैं. पूनिया ने संकेत दिए हैं कि शीर्ष नेताओं से भी उनकी बातचीत जारी है.

इस बातचीत से बात कितनी सुलझेगी, इसका अनुमान लगाना तो मुश्किल है लेकिन यह तो तय है कि बुधवार से शुरू हो रहे विधानसभा के मॉनसून सत्र में टीएस सिंहदेव के उठाए मुद्दे बहस के केंद्र में रहेंगे और छत्तीसगढ़ की राजनीति में अभी कुछ दिन टीएस सिंहदेव के इस्तीफ़े की गूंज बनी रहेगी.