आज दशहरा : जानिए पूर्व जन्म में कौन था लंकापति रावण…?

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सिटी न्यूज रायपुर की विजयादशमी पर विशेष :  दशहरा का पर्व हिन्दू धर्म के लोगों के लिए मुख्य त्योहार है। इस दिन लोग रावण के पुतलों को जलाते हैं। रामायण के अनुसार दशहरा के दिन भगवान राम ने रावण का वध किया था इसलिए यह पर्व बुराई पर अच्छाई का प्रतीक माना जाता है। रावण और राम के जीवन का वर्णन रामायण में दिया गया लेकिन क्या आपको पता है कि रावण अपने पूर्व जन्म में कौन था? हम आपको इस लेख में बताएंगे कि श्रीमद्भागवत के अनुसार रावण अपने पूर्व जन्म में कौन था तो अंत तक यह लेख जरूर पढ़ें। 

लंकापति रावण ने कितने जन्म लिए थे?

आपको बता दें कि रावण के तीन जन्म हुए थे। इन तीनों जन्म में उसके अलग-अलग रूप थे, पुराणों में इन तीनों रूपों का वर्णन भी मिलता है। वैसे तो रावण को पुराणों के अनुसार असुर ही बताया गया है लेकिन आपको बता दें कि श्रीमद्भागवत के अनुसार रावण बनने से पूर्व वह अपने पिछले जन्म में असुर नहीं था। इसके साथ-साथ यह भी बता दें कि रावण का भाई और रावण दोनों ही भगवान विष्णु के द्वारपाल भी थे।रावण पिछले जन्म में कौन था…?  रावण के पिछले जन्म के बारे में श्रीमद्भागवत पुराण में बताया गया है। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार  रावण अपने पूर्व जन्म में भगवान विष्णु के बैकुंठ लोक में द्वारपाल था। बैकुंठ लोक में रावण का नाम जय था। आपको बता दें कि रावण उस लोक में भगवान विष्णु का एक सेवक था। वह अपने कार्य को निष्ठा से करता था। इसके साथ विजय नाम का भी द्वारपाल था जो अगले जन्म में रावण का भाई कुंभकर्ण बना था। आपको बता दें कि पुराणों के अनुसार एक बार भगवान विष्णु जी से मिलने के लिए सनकादि मुनि बैकुंठ लोक में आए थे। उन्होंने जय यानी रावण और विजय यानी कुंभकर्ण से कहा कि उन्हें अंदर प्रवेश करने दें। लेकिन जय और विजय ने उन्हें अंदर प्रवेश नहीं करने दिया। इसके बाद सनकादि मुनि ने क्रोधित होकर उन्हें यह श्राप दिया कि वह दोनों अगले जन्म में राक्षस योनि में जन्म लेंगे। इसके बाद जय और विजय ने विष्णु जी को इसके बारे में बताया और विष्णु जी ने जय और विजय दोनों को क्षमा करने के लिए कहा था। इसके बाद मुनि मे कहा कि जय और विजय की वजह से उन्हें तीन क्षणों की देरी हुई इसलिए जय और विजय का तीन जन्मों तक राक्षस के रूप में जन्म होगा और इनका वध आप खुद यानी विष्णु जी के द्वारा ही होगा। इस प्रकार के वचन कहकर मुनि वहां से चले गए।  इसके बाद रावण का पहला जन्म राक्षस के रूप में हिरण्यकशिपु के रूप में हुआ और कुंभकर्ण का जन्म हिरण्याक्ष नाम के दैत्य के रूप में हुआ था। इनका वध भी भगवान विष्णु ने नरसिह अवतार लेकर किया था। इसके बाद जब उनका जन्म रावण और कुम्भकर्ण के रूप में हुआ तब भगवान विष्णु के रूप यानी प्रभु राम ने उनका वध किया था।  शिशुपाल और दंतवक्र के रूप भी जब उनका तीसरी बार जन्म हुआ तब भगवान श्रीकृष्ण के रूप में विष्णु जी ने उनका वध किया था।