झूठे आरोप में पुलिस ने मुझे नंगा करके उल्टा लटकाया ; प्राइवेट पार्ट पर लगाए करंट ; आरोप था कि मैंने आतंकियों की मदद की ; जो झूठ निकला

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16 साल पहले की बात है। मुंबई लोकल ट्रेन बम ब्लास्ट में 200 से ज्यादा लोग मारे गए थे। 700 के करीब घायल हुए थे। मुझे महाराष्ट्र ATS ने झूठे केस में फंसा दिया। 9 साल जेल में रहा। मुझ पर इतने जुल्म किए कि आज भी याद करके रूह कांप जाती हैं। अक्सर बीमार रहता हूं। आर्थिक बदहाली की तो पूछिए मत। कई बार तो ऐसा लगता है कि मैं पैदा ही क्यों हुआ, पैदा होते मर क्यों नहीं गया। शरीर का शायद ही कोई हिस्सा होगा जिस पर जख्मों के निशान नहीं हों। वो तो शुक्र है अदालत का कि मैं बेगुनाह निकला।

अब आइए आपको मैं अपनी कहानी बताता हूं कि कैसे एक टीचर से मुंबई ट्रेन ब्लास्ट का आरोपी बन गया…

मेरा नाम वाहिद शेख है, मुंबई का रहने वाला हूं। मेरे वालिद मुंबई में एक छोटी सी कंपनी में नौकरी करते थे। चार भाई बहनों में सबसे बड़ा था। मैंने इंग्लिश और उर्दू में मास्टर्स किया था और अंजुमन इस्लाम में बच्चों को इंग्लिश पढ़ाता था। उस वक्त में मुंबरा में रहता था और मेरी शादी हो चुकी थी। सब कुछ मजे में चल रहा था, लेकिन किस्मत में ये खुशियां ज्यादा दिन नहीं थीं।

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तारीख 11 जुलाई, साल 2006, शाम के 6.30 बज का वक्त रहा होगा। मैं अपने बच्चे और पत्नी के साथ एक पड़ोसी के घर पर चाय पीने गया। उनके यहां टीवी चल रहा था। एक ब्रेकिंग खबर आई कि मुंबई की लोकल ट्रेनों में सीरियल बम धमाके हुए हैं।

पिता जी एक प्राइवेट कंपनी में छोटी-मोटी नौकरी करते थे। मैं पेशे से टीचर था और अंजुमन इस्लाम में बच्चों को इंग्लिश पढ़ाता था।

पिता जी एक प्राइवेट कंपनी में छोटी-मोटी नौकरी करते थे। मैं पेशे से टीचर था और अंजुमन इस्लाम में बच्चों को इंग्लिश पढ़ाता था।

कुछ देर बाद हम अपने घर आए और खाना खाकर सो गए। अगले दिन मेरे भाई का फोन आया कि मुझे पूछताछ के लिए पुलिस ने बुलाया है। जब मैं थाने पहुंचा तो मुझे कुछ तस्वीरें दिखाकर पूछा गया कि इन्हें जानते हो, मैंने साफ इनकार कर दिया। उसके बाद मुझसे बोला गया कि तुम्हें हर दिन पुलिस चौकी आकर हाजिरी देनी है। तीन महीने तक ऐसा ही चलता रहा। मैं हर दिन पुलिस स्टेशन जाता, मुझसे पूछताछ की जाती और मैं घर आ जाता। इससे मेंटली मैं काफी परेशान हो गया था। मेरा वजन भी 20 किलो कम हो गया था।

तीन महीने बाद यानी 29 सितंबर को जुमे का दिन था। मुझे सुबह से पुलिस चौकी से 25 कॉल आ चुके थे। वे लोग मुझे पुलिस स्टेशन बुला रहे थे। मैंने कहा कि नमाज पढ़कर आऊंगा, लेकिन पुलिस ने कहा कि अभी आना होगा। मैंने खाना भी नहीं खाया और सीधे ऑटो से पुलिस स्टेशन के लिए निकल गया। रास्ते में एक पुलिसवाले का फोन आया कि सिग्नल पर उतर जाओ, मैं जीप लिए खड़ा हूं।

मैं सिग्नल पर उतर गया। वे एटीएस के लोग थे। मुझे एक जीप में बिठाया और सीधे काला चौकी पुलिस स्टेशन ले गए। वहां जाते ही मुझे हथकड़ी लगा दी गई। मुंह पर काला कपड़ा डाल दिया गया। उन लोगों ने कहा कि तुम्हें बोरीवली में हुई एक हत्या के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया है। उसी शाम को मेरा मेडिकल करवाकर जस्टिस अभय थिप्से की कोर्ट में पेश कर दिया गया। मुझे कुछ कहने, जानने और सुनने का मौका ही नहीं मिला। पुलिस को 14 दिन की रिमांड मिल गई।

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महाराष्ट्र एटीएस के अधिकारी मुझपर लगातार दबाव बना रहे थे कि मैं यह कबूल कर लूं कि मैंने धमाके कराए हैं।

महाराष्ट्र एटीएस के अधिकारी मुझपर लगातार दबाव बना रहे थे कि मैं यह कबूल कर लूं कि मैंने धमाके कराए हैं।

उन 14 दिनों में मेरे साथ जो हुआ, खुदा न करे किसी के साथ हो। एक-एक चीज मेरी जेहन में जस की तस है। मेरे पांव के निचले हिस्से और हथेलियों पर आटा पीसने वाली चक्की के पट्टों से मारा जाता था। मुझे नंगा करके तेज AC वाले कमरे में खड़ा कर दिया जाता। तो कभी तेज हीटर वाले कमरे उल्टा लटका देते थे। इतनी घुटन होती कि लगता सांस निकल जाएगी। जिस कमरे में रहता वहां इतना तेज शोर किया जाता था कि कान का पर्दा ही फट जाए।

इसके बाद मेरी रिमांड बढ़ गई। मेरी छाती की निप्पल्स और प्राइवेट पार्ट पर करंट लगाया जाने लगा। पेशाब करने जाता तो ऐसी जलन होती कि गला फाड़कर चिल्लाने लगता था। कई दिनों तक खाने को कुछ मिला ही नहीं।

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आप भी सोच रहे होंगे कि आखिर पुलिस ऐसा क्यों कर रही थी…

दरअसल मेरे एक रिश्तेदार को पुलिस ने इस बयान के लिए तैयार कर लिया था कि लोकल ट्रेन धमाकों के लिए मैंने पाकिस्तानी आतंकियों को अपने घर में रुकवाया, उन्हें खाना खिलाया और देश से निकलने के लिए रास्ता दिखाया। जबकि इससे मेरा दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था। इधर पुलिस लगातार मुझे टॉर्चर कर रही थी। मुझपर दबाव बना रही थी कि मैं उनकी बात मान लूं और झूठा जुर्म कबूल कर लूं, लेकिन मैं टस से मस नहीं हुआ।

मुझे पुलिस ने रूह कंपा देने वाली प्रताड़ना दी, लेकिन सबसे ज्यादा तकलीफ तब हुई जब पुलिस ने मेरे परिवार को तंग करना शुरू किया, उन्हें मारना-पीटना शुरू किया।

मुझे पुलिस ने रूह कंपा देने वाली प्रताड़ना दी, लेकिन सबसे ज्यादा तकलीफ तब हुई जब पुलिस ने मेरे परिवार को तंग करना शुरू किया, उन्हें मारना-पीटना शुरू किया।

इसके बाद पुलिस ने मेरे परिवार को टारगेट करना शुरू किया। एक दिन पुलिस मेरे छोटे भाई को लेकर थाने आई और उसे बेरहमी से पीटा। उसे देखकर मैं अंदर से हिल गया। फिर भी मैंने पुलिस की बात नहीं मानी। इसके बाद मेरी पत्नी और परिवार वालों के साथ पुलिस ने जुल्म किए, उन्हें पीटा।

मुझे यूएपीए और मकोका (आतंक के आरोप संबंधी केस ) में आरोपी बनाया गया था। एक महीने के बाद मेरी जेल कस्टडी हुई। ऑर्थर रोड जेल जाते वक्त जेलकर्मियों ने डंडे से मेरी पिटाई की। उनका कहना था कि मैं ट्रेन में बम धमाके करके आया हूं। हर दिन जेल में एटीएस के अधिकारी आते और कहते कि सरकारी गवाह बन जाओ। 28 जून 2008 को जेल के भीतर मुझे इतना मारा कि मेरी हड्डियां टूट गईं, मैं खून से लथपथ हो गया। उस शाम को मुझे नासिक जेल भेज दिया गया।

इसके बाद फिर रत्नागिरी और नागपुर के जेल में रहा। कई बार मुझे ख्याल आता था कि मैं पैदा ही क्यों हुआ, मैं मर क्यों नहीं गया। काश मैं शादी न करता, वगैरह..वगैरह।

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इसके बाद हमारा केस नामी वकील युग चौधरी ने लड़ा और हमें बरी करवाया। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि ऐसा कोई सुबूत नहीं है जिसमें पता लगे कि वाहिद के घर पर पाकिस्तानी आए थे और वाहिद ने उनकी खातिरदारी की हो। मेरे रिश्तेदार ने भी बयान दिया कि पुलिस वालों ने उनसे दबाव में बयान दिलवाए थे।

उस मामले में कुल 13 लोग गिरफ्तार हुए थे, जिनमें से सिर्फ मैं रिहा हुआ। रिहा होने के आज 7 साल बाद भी मैं बीमार रहता हूं। पुलिस की पिटाई के जख्म आज भी दर्द देते हैं। मैं डरा हुआ रहता हूं और आर्थिक तौर पर टूट चुका हूं। अपना परिवार चलाने के लिए संघर्ष कर रहा हूं।

source : dainik bhaskar