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देश-भक्ति के गाने उस समय प्रतिबंधित थे, लेकिन लक्ष्मी देवी सुबह सड़कों पर प्रभातफेरी में वंदे मातरम गाया करती थीं। आजादी के दीवानों के पीछे से अंग्रेज फौजी घोड़े दौड़ाते हुए आते, हंटर मारते और घायल कर देते थे।

देश को स्वतंत्र कराने के लिए अनेक देश-भक्तों ने अपना अमूल्य योगदान दिया। उन्हीं में से एक लक्ष्मी देवी भी थीं, जिन्हें कम ही लोग जानते होंगे। रायपुर के वरिष्ठ फोटो जर्नलिस्ट और लेखक विनय शर्मा ने बताया कि लक्ष्मी देवी उनकी नानी थीं। उन्होंने लक्ष्मी देवी के बारे में जो जानकारी दी, वह यहां प्रस्तुत है। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों की बात है।

देश की स्वतंत्रता के लिए सभी के दिल में मशाल जल रही थी। हजारों- लाखों लोगों के दिल में अंग्रेज साम्राज्य के विरुध्द आग धधक रही थी। उन दिनों क्या बच्चा, क्या नौजवान और क्या बूढ़े, सब एक ही जोश में थे, जिसे अंग्रेजी हुकूमत कभी कम नहीं कर पाए। सभी का एक ही मकसद था कि वे घुटनभरे शासन से मुक्त होकर आजादी की खुली सांस ले सकें।

मैं यहां पंजाब के खानखाना गांव की लक्ष्मी देवी का उल्लेख कर रहा हूं। उनमें देश-भक्ति की भावना कूट-कूटकर भरी थी। वे विवाह के बाद कोलकाता चली गई थीं। वहीं पर उन्होंने अपने आपको शिक्षित किया। उन्होंने संगीत की शिक्षा ली। उन्होनें स्वतंत्रता आंदोलन में भी सबसे आगे बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

देश-भक्ति के गाने उस समय प्रतिबंधित थे, लेकिन लक्ष्मी देवी सुबह सड़कों पर प्रभातफेरी में वंदे मातरम गाया करती थीं। आजादी के दीवानों के पीछे से अंग्रेज फौजी घोड़े दौड़ाते हुए आते, हंटर मारते और घायल कर देते थे। फिर भी किसी का जोश कम नहीं होता था।

कई बार रखा गया जेल में

एक बार की बात है। लक्ष्मी देवी ने एक अंग्रेज घुड़सवार का हंटर गुस्से में खींच लिया था। इतना ही नहीं, उन्होंने उसे अंग्रेज घुड़सवार को नीचे गिरा दिया था। आगे भी ऐसे कई मौके आए, जब अंग्रेज अधिकारियों के सामने अलसुबह ठंड में देशभक्ति गीत गाकर लक्ष्मी देवी ने तिरंगा लहराया।

अंग्रेजों ने लक्ष्मी देवी को कोलकाता के अलीपुर जेल में डाल दिया। वहां पर उन पर बहुत जुल्म ढाए गए। लाठियों से पीटा गया। परिणाम स्वरूप उनकी दोनों आंखों की रोशनी चली गई। उनके साथ पांचों बच्चे भी जेल में रह रहे थे। उनको पालना बहुत ही कठिन कार्य था। 1929 से 1937 के बीच उन्हें कई बार जेल में रखा गया।

सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ महिलाओं के पक्ष में थी लक्ष्मी देवी

लक्ष्मी देवी शर्मा कोलकाता में आर्य समाज से जुड़ गई थीं। सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ वे महिलाओं के पक्ष में खड़ी हो गई थीं। महिलाओं की शिक्षा के लिए बहुत प्रचार-प्रसार किया। वे चाहती थीं कि महिलाएं शिक्षित हों, जागरूक हों। उस दौरान उन्हें जानकारी हुई कि लड़कियों के एक स्कूल में पीने के पानी की कमी है। उन्होंने समाज के उस स्कूल के लिए उस स्कूल के लिए नलकूप की व्यवस्था कर दी। इतना ही नहीं, समाज के हर वर्ग के लिए वे हमेशा मदद करने में आगे रहीं। स्वतंत्रता आंदोलन के समय जेल और जेल के बाहर उनके साथ हमेशा रहने वाली उनकी स्वतंत्रता सेनानी सहभागी आभा मायती थीं, जो बाद में चलकर बंगाल में मंत्री बनीं।

पति के साथ वापस लौट गई पंजाब

इस देश के लाखों-करोड़ों लोग यूं ही आजादी से उन्मुक्त सांसें नहीं ले पा रहे हैं। इसके लिए न जाने कितने स्वतंत्रता सेनानियों ने गुमनामी में अपना सब कुछ खो दिया। बदले में कभी कुछ न मांगने की तर्ज पर उन्होंने देश को एक नया सवेरा दिया।

देश के आजाद होने के बाद लक्ष्मी देवी अपने पति धनपत राय शर्मा के साथ वापस पंजाब चली गईं। वहां फगवाड़ा में उनका घर था। वहां पर भी जिंदगी ने उनकी बहुत कठिन परीक्षा ली। उनके पास जो कुछ भी था, वह सब रास्ते में लुट चुका था और पंजाब तक आते-आते वह खाली हाथ हो गई थीं।

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने का नहीं उठाया कोई फायदा

पंजाब में भी उन्हें धोखा ही मिला। जिस पारिवारिक सदस्य को उन्होंने अपनी जमा पूंजी देकर पंजाब में संपत्ति खरीदने के लिए भेजा था, उसने उनका सारा पैसा, जमीन और मकान सब कुछ अपने नाम कर लिया। वृद्धावस्था में उन्होनें

कठिनाइयों का सामना किया, पर कभी भी उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने का कोई फायदा नहीं उठाया। हमेशा कहा- ”मैंने अपने देश के लिए किया।” यही बात अपने पांचों बच्चों को भी सिखाई कि मेहनत और ईमानदारी से जीवन व्यतीत करो।