5 जुलाई 2011 — यही वह दिन था जब सुप्रीम कोर्ट ने बस्तर में चल रहे सलवा जुडूम अभियान को बंद करने का आदेश दिया था। अदालत ने कहा था कि आदिवासी युवाओं को बंदूक थमाकर नक्सलियों के खिलाफ खड़ा करना संविधान और लोकतंत्र दोनों की आत्मा के खिलाफ है।
कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि सभी स्पेशल पुलिस ऑफिसरों (SPOs) से तुरंत हथियार वापस लिए जाएं और उन्हें वैकल्पिक रोजगार उपलब्ध कराया जाए। अदालत का मत था कि यह नीति समाज में भय, अविश्वास और हिंसा को बढ़ाती है।

शाह का बयान और नया विवाद
अब, 14 साल बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में है। वजह है—उपराष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी उम्मीदवार बने सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज बी. सुदर्शन रेड्डी। गृहमंत्री अमित शाह ने हाल ही में कहा कि 2011 में रेड्डी की अध्यक्षता वाली बेंच के फैसले से सलवा जुडूम खत्म हुआ और नक्सलवाद को बढ़ावा मिला। शाह का कहना है कि यदि यह आदेश न आता तो नक्सलवाद 2020 तक समाप्त हो सकता था।

इस बयान के बाद पूर्व न्यायाधीशों और राजनीतिक हलकों में बहस छिड़ गई है।
सलवा जुडूम क्या था?
‘सलवा जुडूम’ गोंडी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है शांति अभियान। इसे 2005 में छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके, खासकर दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर में शुरू किया गया।
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कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा इस अभियान के प्रमुख चेहरे थे।
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ग्रामीण युवाओं को SPO बनाकर हथियार दिए गए।
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गांव-गांव में कैंप बने और इसे नक्सलियों के खिलाफ आदिवासियों का आंदोलन बताया गया।
हालांकि, मानवाधिकार संगठनों ने इसे राज्य-प्रायोजित हिंसा करार दिया। उनके मुताबिक, इस दौरान हत्या, महिलाओं पर अत्याचार, जबरन विस्थापन और गांवों की तबाही हुई। नक्सलियों ने भी हिंसक हमलों से जवाब दिया।

सुप्रीम कोर्ट तक मामला
मानवाधिकार कार्यकर्ता नंदिनी सुंदर, इतिहासकार रामचंद्र गुहा और अन्य लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। अदालत ने 2011 में कहा कि बिना ट्रेनिंग आदिवासियों को हथियार देना असंवैधानिक है और सरकार को सभी SPO से हथियार वापस लेने के आदेश दिए।
फैसले के बाद
सरकार को SPO व्यवस्था खत्म करनी पड़ी। बाद में छत्तीसगढ़ ने DRG (डिस्ट्रिक्ट रिज़र्व गार्ड) और बस्तर फाइटर्स जैसी नई फोर्स खड़ी की। आलोचकों का कहना है कि सलवा जुडूम भले नाम से खत्म हो गया, लेकिन उसकी नीति आज भी अलग-अलग रूप में जारी है।
शाह बनाम जज
अमित शाह ने कहा कि जस्टिस रेड्डी का फैसला नक्सलवाद को ताकत देने वाला था। दूसरी ओर, रेड्डी का कहना है कि यह निर्णय उनका व्यक्तिगत नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट का था, और शाह ने फैसले को ठीक से पढ़ा नहीं।
Salwa Judum
पूर्व जजों का भी इस पर मतभेद है।
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56 पूर्व न्यायाधीशों ने कहा कि जजों को राजनीतिक बहसों में नहीं पड़ना चाहिए।
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वहीं कुछ रिटायर्ड जजों और विशेषज्ञों का मानना है कि फैसले की गलत व्याख्या न्यायपालिका की स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचाती है।
महेंद्र कर्मा और सलवा जुडूम की विरासत
महेंद्र कर्मा, जो इस अभियान के सबसे बड़े चेहरे थे, 2013 में दरभा घाटी नक्सली हमले में मारे गए। इसके बाद सलवा जुडूम और भी विवादों में घिर गया।
सलवा जुडूम 2 की मांग
महेंद्र कर्मा के बेटे छविंद्र कर्मा का मानना है कि नक्सलवाद के खात्मे के लिए फिर से सलवा जुडूम जैसे आंदोलन की जरूरत है। उनका कहना है कि बंदूक से कुछ समय तक नक्सलियों को रोका जा सकता है, लेकिन विचारधारा को खत्म करने के लिए समाज को खड़ा होना होगा।