कोरबा जिले के झगरहा गांव के किसान रामरतन निकुंज (67) ने धान की खेती में एक नई मिसाल कायम की है। उन्होंने वर्मी मैट्रिक्स ग्रिड पद्धति अपनाकर न केवल पैदावार बढ़ाई, बल्कि लागत भी आधी कर दी। इस तकनीक से वे प्रति हेक्टेयर 95 से 106 क्विंटल तक धान का उत्पादन कर रहे हैं, जबकि छत्तीसगढ़ में औसत पैदावार अभी भी करीब 80 क्विंटल है।
रामरतन ने बताया कि 2018 में एसईसीएल गेवरा से सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने खेती में कुछ नया करने की ठानी। उन्होंने धान की पारंपरिक खेती का अध्ययन किया और पाया कि उत्पादन सीमित है। ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी संजय पटेल से मार्गदर्शन लेने के बाद वे बिलासपुर और रायपुर में आयोजित कृषि मेलों में भी गए। तीन साल पहले उन्होंने वर्मी मैट्रिक्स ग्रिड पद्धति को अपनाते हुए 2 हेक्टेयर में धान की खेती शुरू की।
इस पद्धति में पौधों की 15–20 दिन की नर्सरी तैयार की जाती है और वर्मी कंपोस्ट को कतारबद्ध डालकर रोपाई की जाती है। इससे पौधों की वृद्धि बेहतर होती है, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और कीटों का असर कम होता है। रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग भी घट जाता है, जिससे लागत करीब 50% तक कम हो जाती है।
शुरुआत में प्रति हेक्टेयर 88 क्विंटल उत्पादन हुआ, लेकिन 2023 में यह बढ़कर 106 क्विंटल तक पहुंच गया। इस उपलब्धि को देखने जिलेभर के कृषि अधिकारी उनके खेत पर पहुंचे। अब आसपास के दादर, खरमोरा, बरबसपुर जैसे गांवों के किसान भी इस पद्धति को अपना रहे हैं।
रामरतन वर्तमान में पांच एकड़ में खेती कर रहे हैं, जिसमें करीब 1 लाख रुपये लागत आती है, जबकि सरकारी दर के अनुसार उन्हें धान से करीब 6.20 लाख रुपये की आमदनी होती है। इसके अलावा वे धान के साथ सब्जियां भी उगा रहे हैं और आम, बेर, चीकू का बगीचा भी लगा चुके हैं। आम की नई किस्म तैयार करने के लिए वे कलम पद्धति से पौधों का उत्पादन कर रहे हैं।