रायपुर। भारतमाला प्रोजेक्ट के तहत बनने वाले रायपुर-विशाखापट्टनम इकोनॉमिक कॉरिडोर में बड़े स्तर पर मुआवजा घोटाले का मामला सामने आया है। जांच में खुलासा हुआ है कि सड़क निर्माण के लिए रूट फाइनल होने से पहले ही अभनपुर तहसील के चार गांवों की जमीनों का अधिग्रहण कर लिया गया था। इस प्रक्रिया में राजस्व अधिकारियों ने किसानों की निजी जमीनों का रिकॉर्ड बदलकर उन्हें सरकारी परियोजना के नाम कर दिया, जबकि जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया और मुआवजा तय होना बाकी था।
क्या है मामला?
सड़क एवं परिवहन मंत्रालय ने इस प्रोजेक्ट के लिए अप्रैल 2019 में रूट तय किया था। लेकिन इससे पहले ही—सितंबर 2018 से लेकर जून 2019 के बीच—84 किसानों की जमीनों का नामांतरण भारतमाला परियोजना के नाम कर दिया गया। इससे न केवल प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ बल्कि कई किसानों को करोड़ों का मुआवजा भी गलत तरीके से मिला।
केस स्टडी:
केस 1:
किसान किशोर शर्मा की जमीन (खसरा नंबर 1664/9) का नामांतरण 13 सितंबर 2018 को कर दिया गया, जबकि प्रोजेक्ट का रूट अप्रैल 2019 में फाइनल हुआ। बाद में मार्च 2021 में इस जमीन के बदले किशोर शर्मा को 1.18 करोड़ रुपए का मुआवजा दे दिया गया।
केस 2:
किसान शशिकांत की जमीन (खसरा नंबर 1665) का नामांतरण 4 अक्टूबर 2018 को कर दिया गया, जो रूट फाइनल होने से 6 महीने पहले हुआ। उन्हें 2021 में 38.68 लाख रुपए मुआवजा मिला।
केस 3:
गांव नायकबांधा में 26 अप्रैल 2019 को कुल 72 खसरा नंबरों का नामांतरण भारतमाला परियोजना के नाम कर दिया गया, जबकि केंद्र सरकार से इस अधिग्रहण को मंजूरी 18 मार्च 2021 को मिली।
केस 4:
भिल्वाडीह गांव में खसरा नंबर 849/2,3,4,5 का नामांतरण 16 जून 2019 को किया गया, जबकि किसानों को मुआवजा मार्च 2021 के बाद मिला।
सबसे ज्यादा गड़बड़ी नायकबांधा गांव में
इस गांव में अकेले 72 खसरा नंबरों का रिकॉर्ड समय से पहले संशोधित कर दिया गया। इसके अलावा भेल्वाडीह में 4, टोकरो में 6 और सातपारा में 3 जमीनों का नामांतरण अवार्ड (मुआवजा) तय होने से पहले किया गया।
क्या कहता है नियम?
राजस्व नियमों के मुताबिक, किसी भी सरकारी परियोजना के तहत तब तक जमीन का नामांतरण नहीं हो सकता जब तक अधिग्रहण का अवार्ड (नोटिफिकेशन) पारित न हो। इस प्रक्रिया को दरकिनार कर अधिकारियों ने नियमों का उल्लंघन करते हुए करोड़ों का मुआवजा जारी करा दिया।
प्रशासन का जवाब
रवि सिंह, एसडीएम (राजस्व), अभनपुर ने कहा,
“यदि किसी भी परियोजना में नामांतरण अवार्ड से पहले हुआ है, तो यह गंभीर अनियमितता है। मामले की जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।”
यह पूरा मामला न केवल मुआवजा वितरण की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे अफसरशाही और रसूख के मेल से सरकारी नीतियों को दरकिनार किया जा सकता है।