रायपुर। अंबेडकर अस्पताल के एडवांस कार्डियक इंस्टीट्यूट (ACI) में हृदय रोग जांच कराने आए मरीजों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ईको कार्डियोग्राफी की सिर्फ एक मशीन होने के कारण सैकड़ों मरीज घंटों इंतजार करते हैं, लेकिन जांच कुछ ही मरीजों की हो पाती है। बाकी को अगली तारीख देकर लौटा दिया जाता है।
सोमवार को भास्कर टीम की मौजूदगी में बड़ी संख्या में मरीज ईको जांच के इंतजार में बैठे थे। स्थिति यह थी कि भीड़ के कारण बैठने या चलने तक की जगह नहीं थी। एक मरीज ने बताया कि पर्ची लिए एक घंटे से ज्यादा हो गया, लेकिन अब तक नंबर नहीं आया।
इसी दौरान मशीन को दूसरे कमरे में ले जाया गया, जिससे मरीजों में नाराजगी फैल गई। एक डॉक्टर ने बताया कि मशीन कुछ देर के लिए दूसरे विभाग में भेजी गई है और जल्द लौट आएगी। लेकिन मशीन आने से पहले ही 12:30 बजे स्टाफ ने पर्चियां लेना बंद कर दीं और मरीजों को दूसरे दिन आने को कह दिया।
जरूरी सर्जरी भी रुकी
जगदलपुर से आए बितला नामक युवक ने बताया कि उनके पिता की रीढ़ की हड्डी की सर्जरी DKS अस्पताल में होनी है। डॉक्टरों ने पहले ईको जांच कराने को कहा था, लेकिन शनिवार से लेकर सोमवार तक भी जांच नहीं हो सकी।
इसी तरह आशीष नामक युवक ने बताया कि उनकी मां को सांस लेने में दिक्कत है, डॉक्टर ने भर्ती से पहले ईको कराने को कहा था, लेकिन स्टाफ ने समय खत्म होने का हवाला देकर उन्हें लौटा दिया।
ईको जांच का महत्व
ईको कार्डियोग्राफी मशीन दिल की कार्यप्रणाली जांचने के लिए जरूरी उपकरण है। इससे हार्ट की पंपिंग क्षमता, वाल्व की स्थिति और धमनी की दिक्कतों का पता चलता है। अंबेडकर अस्पताल में यह जांच मुफ्त में होती है, जबकि निजी अस्पतालों में इसके लिए 1500 से 3500 रुपए तक खर्च होते हैं।
प्रशासन की प्रतिक्रिया
अस्पताल अधीक्षक डॉ. संतोष सोनकर ने कहा कि, “किसी मरीज को जानबूझकर नहीं लौटाया जाता, लेकिन मशीन की कमी के कारण देरी होती है। नई मशीन के लिए प्रस्ताव भेजा गया था, जिसे स्वीकृति मिल चुकी है।”
हार्ट सर्जरी के लिए भी इंतजार
ACI राज्य का एकमात्र सरकारी हृदय अस्पताल है, जहां बायपास और ओपन हार्ट सर्जरी होती है। यहां भी मरीजों को महीनों तक इंतजार करना पड़ता है। कुछ मरीज ऑपरेशन के इंतजार में भर्ती रहते हैं, और कुछ की मौत तक हो चुकी है।
निष्कर्ष:
सरकारी अस्पताल में बेहतर इलाज की उम्मीद लेकर आने वाले मरीजों को मशीन की कमी और स्टाफ की बेरुखी के कारण निराशा झेलनी पड़ रही है। सिस्टम में संसाधन की कमी और कार्यप्रणाली की लचरता, दोनों मिलकर मरीजों की परेशानी को बढ़ा रहे हैं।