छत्तीसगढ़ विधानसभा के हाल ही में समाप्त हुए मानसून सत्र में एक चौंकाने वाला ट्रेंड देखने को मिला। जनप्रतिनिधियों की दिलचस्पी जनता की समस्याओं से अधिक निर्माण कार्यों से जुड़ी ठेकेदारी और खरीदी के मामलों में दिखी। सत्र के दौरान विधायकों ने सड़क निर्माण में गड़बड़ियों, भुगतान में देरी, ठेकेदारों पर कार्रवाई, निविदाओं में अनियमितता और सरकारी खरीद से संबंधित 38 सवाल सदन में उठाए। यह सवाल 32 विधायकों ने पूछे, जिनमें से अधिकांश कांग्रेस से जुड़े हैं। कई विधायकों ने इस विषय पर एक से अधिक सवाल भी पूछे।
सत्र के दौरान अवैध रेत खनन, रेत भंडारण और परिवहन, साथ ही जिला खनिज निधि (DMF) मद से की गई खरीदी जैसे मामलों पर भी प्रश्न उठे। पांच दिन चले सत्र के दौरान कुल 996 सवाल लगाए गए, मगर प्रश्नकाल में केवल 28 सवालों पर ही चर्चा हो पाई।
9 विधायकों ने पूछा एक जैसा सवाल
प्रदेश के नौ अलग-अलग क्षेत्रों से चुने गए विधायकों ने लगभग एक ही विषय पर सवाल पूछे। उन्होंने खरीफ सीजन में धान की खेती और फसल कटाई प्रयोग के परिणामों से जुड़ी जानकारी मांगी। सवाल पूछने वालों में यशोदा निलाम्बर वर्मा, विक्रम मंडावी, शेषराज हरबंस, कुंवर सिंह निषाद, राघवेंद्र कुमार सिंह, इंद्र साव, व्यास कश्यप, उत्तरी गनपत जांगड़े और संगीता सिन्हा शामिल हैं।
अफसरों ने जवाब में दिखाई “क्रिएटिविटी“
सत्र के दौरान कुछ सवालों के जवाब में अधिकारियों की कार्यशैली पर भी सवाल उठे।
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18 जुलाई को विधायक धर्मजीत सिंह ने पूरे प्रदेश के आंगनबाड़ी केंद्रों में वितरित सामग्रियों की गुणवत्ता पर शिकायतों के संदर्भ में जांच की जानकारी मांगी थी, लेकिन अधिकारियों ने जवाब केवल तखतपुर विधानसभा तक सीमित कर दिया। विधायक की आपत्ति पर अध्यक्ष ने निर्देश दिया कि यह जवाब अगली बैठक में दोबारा प्रस्तुत किया जाए।
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आशाराम नेताम ने महिला एवं बाल विकास विभाग के जिला कार्यालयों के नवीनीकरण और कर्मचारियों के लिए बनाए गए केबिन व CCTV कैमरों की स्थापना पर खर्च की जानकारी मांगी थी। लेकिन उन्हें भी सिर्फ कांकेर जिले की जानकारी देकर संतोष करना पड़ा।
इस मानसून सत्र से साफ है कि विधायक अब विकास कार्यों से ज़्यादा निर्माण और ठेकेदारी से जुड़े मुद्दों में गहरी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। वहीं, अफसरों की ओर से अधूरे जवाब भी सवालों के घेरे में हैं।