Home Chhattisgarh news Raipur news सीएजी रिपोर्ट में बड़ा खुलासा: रायपुर का स्काईवॉक बना फिजूलखर्ची की मिसाल, 36 करोड़ बर्बाद

सीएजी रिपोर्ट में बड़ा खुलासा: रायपुर का स्काईवॉक बना फिजूलखर्ची की मिसाल, 36 करोड़ बर्बाद

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सीएजी रिपोर्ट में बड़ा खुलासा: रायपुर का स्काईवॉक बना फिजूलखर्ची की मिसाल, 36 करोड़ बर्बाद

राजधानी रायपुर का बहुचर्चित स्काईवॉक प्रोजेक्ट एक बार फिर सुर्खियों में है। देश की नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में इस प्रोजेक्ट को गैर-जरूरी और बिना उपयोगिता वाला बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस अधूरी योजना पर अब तक 36.82 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, जो पूरी तरह व्यर्थ चले गए।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने विधानसभा के मानसून सत्र के अंतिम दिन यह रिपोर्ट सदन में प्रस्तुत की। रिपोर्ट के खुलासे के बाद एक बार फिर यह मामला राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गया है।

बिना योजना, बिना मंजूरी शुरू हुआ निर्माण

सीएजी की रिपोर्ट में यह भी साफ किया गया है कि इस प्रोजेक्ट को बिना किसी तकनीकी और प्रशासनिक स्वीकृति के जल्दबाजी में शुरू किया गया था। टेंडर जारी करने से पहले कंसल्टेंट द्वारा जरूरी प्रक्रियाएं पूरी नहीं की गई थीं, और अधूरी तैयारी के बावजूद कार्यादेश जारी कर दिया गया। परियोजना के ड्राइंग और डिजाइन में बार-बार बदलाव होने से लागत भी बढ़ती गई और अंततः यह अधूरी रह गई।

8 साल से अधूरे ढांचे को फिर से शुरू करने की कोशिश

अब राज्य सरकार इस अधूरे स्काईवॉक को पूरा करने की नई पहल कर रही है। इसके लिए सार्वजनिक निर्माण विभाग (PWD) ने 37 करोड़ 75 लाख रुपये की स्वीकृति दे दी है। पीएसएस कंस्ट्रक्शन, रायपुर को यह कार्य सौंपा गया है। स्काईवॉक करीब 1.5 किमी लंबा होगा और इसमें 12 स्थानों पर एस्केलेटर और सीढ़ियां लगाई जाएंगी, जिससे लोगों की आवाजाही सुगम हो सके।

अरपा-भैंसाझार परियोजना भी सवालों के घेरे में

सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में बिलासपुर की अरपा-भैंसाझार परियोजना को लेकर भी गंभीर टिप्पणियां की हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इस योजना को भी बिना जरूरी पर्यावरणीय मंजूरी, केंद्रीय जल आयोग की स्वीकृति और अंतरराज्यीय सहमति के ही शुरू कर दिया गया था। भूमि अधिग्रहण में हुई देरी ने प्रोजेक्ट की रफ्तार को और धीमा कर दिया। दस साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद यह परियोजना अब तक अधूरी है।

निष्कर्ष

सीएजी की इस रिपोर्ट से यह साफ होता है कि छत्तीसगढ़ में कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स बिना ठोस योजना और मंजूरी के शुरू किए गए, जिससे न सिर्फ सरकारी धन की बर्बादी हुई, बल्कि जनता की अपेक्षाएं भी अधूरी रह गईं। अब देखना होगा कि सरकार इन अधूरे प्रोजेक्ट्स को किस तरह आगे बढ़ाती है और पारदर्शिता व जवाबदेही सुनिश्चित कर पाती है या नहीं।