बिलासपुर/रायपुर, जुलाई 2025।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मंदिर की संपत्ति और प्रबंधन को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि पुजारी को मंदिर का स्वामित्व प्राप्त नहीं होता। वह केवल पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यों के लिए नियुक्त एक सेवक या प्रबंधक होता है। कोर्ट ने मंदिर प्रबंध समिति में ट्रस्टी बनने के पुजारी के दावे को खारिज करते हुए, राजस्व मंडल बिलासपुर के निर्णय को सही ठहराया है।
मामला: धमतरी के बिलाईमाता मंदिर से जुड़ा विवाद
यह मामला श्री विंध्यवासिनी मां बिलाईमाता मंदिर (धमतरी) से जुड़ा है, जहां मंदिर के पुजारी मुरली मनोहर शर्मा ने खुद को ट्रस्ट का ट्रस्टी बनाए जाने की मांग को लेकर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। पुजारी ने यह दावा किया कि मंदिर उनके पूर्वजों द्वारा निर्मित है, इसलिए उन्हें मंदिर ट्रस्ट समिति में अधिकार मिलना चाहिए।
तहसीलदार ने दिया था पक्ष में आदेश, बाद में सभी अधिकारियों ने खारिज किया
पुजारी ने तहसीलदार कार्यालय में आवेदन देकर ट्रस्ट रिकॉर्ड में नाम दर्ज करने की मांग की थी। तहसीलदार ने पुजारी के पक्ष में आदेश जारी करते हुए ट्रस्टी बनाने की सिफारिश की थी, लेकिन यह आदेश एसडीएम द्वारा रद्द कर दिया गया। फिर अपर आयुक्त रायपुर और राजस्व मंडल बिलासपुर ने भी पुजारी की याचिका खारिज कर दी।
हाईकोर्ट में अपील, पर नहीं मिला राहत
राजस्व मंडल के निर्णय के विरुद्ध पुजारी ने हाईकोर्ट में अपील की, जिसमें उन्होंने दलील दी कि तहसीलदार का आदेश न्यायोचित था और बाद के सभी अधिकारियों ने तथ्यों की अनदेखी की। उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर के निर्माण और देखरेख में उनके पूर्वजों की भूमिका थी, इसलिए ट्रस्ट में उन्हें शामिल किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट का फैसला: ट्रस्ट समिति का पंजीकरण वैध, पुजारी का स्वामित्व नहीं
हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच (मुख्य न्यायाधीश रमेश कुमार सिन्हा और जस्टिस बीडी गुरु) ने साफ कहा कि मंदिर की कानूनी तौर पर पंजीकृत ट्रस्ट समिति (1974 से) ही मंदिर की संपत्ति और प्रबंधन की अधिकृत संस्था है। साथ ही 1989 में सिविल जज द्वारा दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि ट्रस्ट संपत्ति का मालिक नहीं होता और ना ही पुजारी को मंदिर की जमीन या संपत्ति का स्वामी माना जा सकता है।