रायपुर। घरेलू ऑटोमोबाइल सेक्टर की दिग्गज कंपनी टाटा मोटर्स (Tata Motors) के वाहन खरीदने की सोच रहे ग्राहकों को अगले महीने से जेब ज्यादा ढीली करनी होगी। कंपनी ने इनपुट कॉस्ट और कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के असर को कम करने के लिए अपने सभी वाणिज्यिक वाहनों (Commercial Vehicles) के दामों में 2.5% तक की बढ़ोतरी करने का आधिकारिक ऐलान किया है। नई दरें 1 जुलाई 2026 से प्रभावी रूप से लागू कर दी जाएंगी।

चालू वित्त वर्ष में दूसरी बार बढ़े दाम

मौजूदा वित्तीय वर्ष 2026-27 में टाटा मोटर्स की ओर से कीमतों में किया गया यह दूसरा बड़ा इजाफा है। इससे पहले कंपनी ने अप्रैल महीने में भी बढ़ती लागत का हवाला देकर वाणिज्यिक वाहनों के दाम करीब 1.5% तक बढ़ाए थे। कंपनी का कहना है कि कमोडिटी मार्केट में उतार-चढ़ाव और निर्माण लागत में लगातार हो रही वृद्धि के चलते यह कदम उठाना बेहद जरूरी हो गया था। यह बढ़ोतरी अलग-अलग मॉडल, वेरिएंट और पेलोड क्षमता के आधार पर तय की जाएगी।

सभी कमर्शियल व्हीकल्स पर दिखेगा असर

टाटा मोटर्स की ओर से 18 जून को जारी आधिकारिक बयान के मुताबिक, 1 जुलाई से लागू होने वाली नई मूल्य सूची कंपनी के पूरे कॉमर्शियल व्हीकल पोर्टफोलियो पर लागू होगी। हालांकि, किस मॉडल की कीमत कितनी बढ़ेगी, इसका सटीक खुलासा अभी नहीं किया गया है। बता दें कि टाटा मोटर्स भारतीय बाजार में:

  • छोटे कमर्शियल वाहन (SCV)

  • पिक-अप ट्रक और मालवाहक गाड़ियां

  • इंटरमीडिएट और हेवी कमर्शियल व्हीकल्स (M&HCV)

  • स्कूल और ट्रैवलर बसें

जैसी बड़ी रेंज की बिक्री करती है, और इन सभी के दाम अब बढ़ जाएंगे।

आम गाड़ियां और इलेक्ट्रिक कारें भी होंगी महंगी

कमर्शियल सेगमेंट के साथ-साथ टाटा मोटर्स ने अपने पैसेंजर व्हीकल्स (Passenger Vehicles) के पोर्टफोलियो में भी 1.5% तक की बढ़ोतरी करने की घोषणा की है। यह नया नियम भी 1 जुलाई से ही लागू होगा। कंपनी के मुताबिक, बाजार में बढ़ रहे इन्फ्लेशनरी प्रेशर (महंगाई के दबाव) के कारण कारों के दाम बढ़ाए जा रहे हैं। खास बात यह है कि यह बढ़ोतरी पेट्रोल-डीजल (ICE) मॉडल्स के साथ-साथ टाटा की लोकप्रिय इलेक्ट्रिक गाड़ियों (EVs) पर भी समान रूप से लागू होगी।

समझें क्या होती है इनपुट कॉस्ट (Input Cost)?

किसी भी वाहन के निर्माण में लगने वाले बुनियादी कच्चे माल—जैसे स्टील, एल्युमीनियम, रबर, प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक चिप्स—की कुल खरीद लागत, फैक्ट्री के परिचालन खर्च और मजदूरी को मिलाकर जो अंतिम खर्च आता है, उसे इनपुट कॉस्ट कहते हैं। जब वैश्विक या घरेलू बाजार में ये सामग्रियां महंगी होती हैं, तो ऑटो कंपनियां नुकसान से बचने के लिए इसका कुछ हिस्सा ग्राहकों के ऊपर डाल देती हैं।