बिलासपुर। तंवर सतगढ़ समाज के पदाधिकारियों और DSP मेखलेंद्र प्रताप सिंह के बीच विवाद गहराता जा रहा है। समाज के प्रमुख पदाधिकारियों ने पुलिस अधिकारी के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए उस पर अपने पद का दुरुपयोग करने और झूठा मुकदमा दर्ज कराने का आरोप लगाया है। समाज ने स्पष्ट किया कि न तो किसी का बहिष्कार किया गया है और न ही किसी प्रकार की धमकी दी गई है।
यह पूरा मामला उस वक्त गरमाया जब सरगुजा में पदस्थ DSP डॉ. मेखलेंद्र प्रताप सिंह ने बिलासपुर के कोटा थाने में शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि समाज के अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों ने उनके अंतरजातीय विवाह के कारण उनके और उनके परिवार के सदस्यों का सामाजिक बहिष्कार किया और उन्हें धमकाया। इसके आधार पर पुलिस ने समाज के कुछ पदाधिकारियों पर केस दर्ज कर लिया।
समाज बोला: बैठक में केवल चर्चा हुई, कोई बहिष्कार नहीं
दूसरी ओर, समाज के पदाधिकारियों ने इन आरोपों को सिरे से नकारते हुए कहा कि कोरबा में हुई बैठक केवल एक नियमित सामाजिक कार्यक्रम थी, जिसमें नई कार्यकारिणी का गठन और भविष्य की योजनाओं पर चर्चा की गई थी। उन्होंने दावा किया कि किसी भी व्यक्ति को समाज से अलग करने या बहिष्कृत करने का कोई निर्णय नहीं लिया गया। उन्होंने केवल एक नोटिस जारी कर जानकारी मांगी थी।
पदाधिकारियों का आरोप- DSP ने पद का किया गलत इस्तेमाल
समाज के लोगों का आरोप है कि DSP ने पुलिस महकमे में अपनी ऊंची हैसियत का इस्तेमाल कर झूठे आरोपों के सहारे बुजुर्ग समाजसेवियों और पदाधिकारियों को कानूनी पचड़े में फंसा दिया। उन्होंने कहा कि न तो किसी को गाली दी गई, न धमकी दी गई, बल्कि मामला व्यक्तिगत प्रतिशोध के तहत तूल पकड़ रहा है।
दो जिलों में उलझा मामला: कोरबा में बैठक, FIR बिलासपुर में
यह मामला इसलिए भी विवादास्पद बन गया है क्योंकि जिस बैठक को लेकर आरोप लगाए जा रहे हैं, वह कोरबा में आयोजित हुई थी, जबकि एफआईआर बिलासपुर जिले में दर्ज कराई गई। समाज के लोगों ने पुलिस कार्रवाई पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यह पूरी प्रक्रिया पक्षपातपूर्ण लगती है। उन्होंने मामले की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए एसपी और आईजी से औपचारिक शिकायत भी की है।
फिलहाल, यह मामला सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है। अब देखना होगा कि इस मामले की जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है और सच्चाई क्या सामने आती है।