Home Chhattisgarh news कोरबा के किसान बूंदराम ने प्राकृतिक खेती से घटाई लागत, 361 किसान हुए प्रेरित

कोरबा के किसान बूंदराम ने प्राकृतिक खेती से घटाई लागत, 361 किसान हुए प्रेरित

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कोरबा के किसान बूंदराम ने प्राकृतिक खेती से घटाई लागत, 361 किसान हुए प्रेरित

कोरबा जिले के करतला ब्लॉक के जोगीपाली निवासी 65 वर्षीय बूंदराम मांझी ने पिछले तीन सालों से प्राकृतिक खेती अपनाकर रासायनिक खाद और दवाओं पर निर्भरता खत्म कर दी है। बूंदराम अपने खेतों में 10 तरह के कड़वे पत्तों से खुद प्राकृतिक दवा तैयार करते हैं।\

उन्होंने बताया कि पैदावार उतनी ही होती है जितनी रासायनिक खाद डालने से होती थी, लेकिन लागत अब 75 प्रतिशत तक घट गई है। इस प्रक्रिया को देखकर आसपास के 361 किसान भी रासायनिक उत्पादों को छोड़कर प्राकृतिक खेती की ओर बढ़े हैं।

बूंदराम ने कहा कि उनके पास चार एकड़ जमीन है, जिसमें वह धान के साथ-साथ दलहन और तिलहन की फसल उगाते हैं। पहले उनके पूर्वज गोबर खाद का उपयोग करते थे, लेकिन बाद में यूरिया और डीएपी के बिना खेती करना मुश्किल हो गया था, जिससे लागत बढ़ गई थी।

नाबार्ड के जैविक खेती प्रोजेक्ट के दौरान उन्हें खाद और दवा खुद बनाने की जानकारी मिली। उन्होंने बताया कि पहले उन्होंने 200 लीटर पानी, 10 किलो गोबर, 10 लीटर गोमूत्र, 2 किलो गुड़, 2 किलो बेसन और 1 किलो मिट्टी डालकर खाद बनाई। इसे एक सप्ताह तक रखा और फिर खेत में तीन बार छिड़काव किया।

इसके बाद उन्होंने कीटों से बचाव के लिए नीम, करंज, पपीता और सीताफल के पत्तों से दवा तैयार की। पत्तों को पकाकर 3-4 दिन रखा और फिर खेत में छिड़काव किया। इस प्राकृतिक दवा से कीटों का नुकसान नहीं हुआ और पौधे स्वस्थ रहे।

बूंदराम ने कहा कि पहले एकड़ पर खेती की लागत लगभग 15 हजार रुपए थी, जो अब 2-3 हजार रुपए तक रह गई है। सिर्फ गुड़ और बेसन खरीदना पड़ता है, बाकी सामग्री घर से उपलब्ध होती है। इसके अलावा मिट्टी की उर्वरता बढ़ने से पैदावार भी पहले से अधिक होने लगी है।

बूंदराम ने यह भी बताया कि अब रासायनिक खाद के लिए लोन लेने या समितियों के चक्कर लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। उनके बाड़ी में लगे आम के पौधों में भी यही प्राकृतिक दवा इस्तेमाल की जाती है।