छत्तीसगढ़ के 11 पुलिस अधिकारियों और जवानों को इस साल वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इनमें एक नाम खास है — इंस्पेक्टर संजय पोटाम, जो कभी नक्सलियों के खेमे में थे लेकिन अत्याचारों से तंग आकर आत्मसमर्पण कर पुलिस में शामिल हुए।
संजय ने पहले गोपनीय सैनिक के रूप में काम शुरू किया, फिर कॉन्स्टेबल बने और महज 7 साल में पांच प्रमोशन पाकर इंस्पेक्टर के पद तक पहुंचे। नक्सलियों के बीच बिताए समय ने उन्हें उनकी रणनीतियों और भागने के रास्तों की गहरी समझ दी, जिसे उन्होंने पुलिस अभियानों में उनके खिलाफ इस्तेमाल किया। हाल ही में दंतेवाड़ा–बीजापुर सीमा के जंगलों में एक मुठभेड़ के दौरान उन्होंने अपनी टीम का नेतृत्व करते हुए तीन नक्सलियों को ढेर किया।

इसी तरह, इंस्पेक्टर चैतराम गुरुपंच ने 14 मार्च 2003 को कटे कल्याण इलाके में नक्सलियों के एंबुश का सामना किया और जवाबी कार्रवाई में दो महिला नक्सलियों को मार गिराया। उन्होंने बताया कि ऐसी स्थितियों में ‘काउंटर एंबुश’ रणनीति अपनाई जाती है, जिसमें जवान दुश्मन को चारों तरफ से घेरते हैं।
हेड कॉन्स्टेबल दिनेश भास्कर को भी वीरता पुरस्कार मिला। उन्होंने दंतेवाड़ा में एक ऑपरेशन में हिस्सा लिया, जहां दो महिला नक्सली मारी गईं। वापसी के दौरान हुए आईईडी ब्लास्ट में उनके साथी आरक्षक के दोनों पैर उखड़ गए, जिसे उन्होंने कठिन हालात में संभाला।

रायपुर के निरीक्षक भुनेश्वर कुमार साहू को भी वीरता पदक मिला। 17 जून 2021 को उन्होंने चंदामेटा जंगल में एक कठिन सर्च ऑपरेशन का नेतृत्व किया। बरसात और दुर्गम रास्तों के बीच पहुंची टीम पर नक्सलियों ने अंधाधुंध फायरिंग की, लेकिन साहू ने न केवल अपनी टीम का मनोबल बनाए रखा बल्कि जवाबी कार्रवाई में सफलता भी दिलाई। वे अब तक 25 से अधिक नक्सल अभियानों का नेतृत्व कर चुके हैं।
इस साल छत्तीसगढ़ के 12 जिलों के अफसरों को अलग-अलग श्रेणियों में सम्मान मिला, जिनमें से सबसे ज्यादा — 8 अधिकारी — दंतेवाड़ा के हैं।