रायपुर। छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है, लेकिन अब यहां औषधीय गुणों वाले चावल भी उगाए जा रहे हैं। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने ऐसी विशेष किस्में विकसित की हैं जो कैंसर, डायबिटीज, कुपोषण और डायरिया जैसी बीमारियों से लड़ने में मददगार हैं। इन चावलों की मांग अब चीन और अफ्रीका तक पहुंच गई है।

प्रमुख तथ्य:
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संजीवनी चावल: कैंसर मरीजों की इम्यूनिटी बढ़ाने में सहायक
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मधुराज-55: शुगर पेशेंट्स के लिए विशेष रूप से विकसित
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जिंक राइस-2: बच्चों में कुपोषण दूर करने में कारगर
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23,250 किस्में: विश्वविद्यालय के पास धान की विशाल विविधता
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अंतर्राष्ट्रीय मांग: चीन और अफ्रीका समेत कई देशों से आ रही डिमांड

विशेष किस्मों के गुण:
1. संजीवनी चावल:
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कैंसर रोगियों के लिए प्राकृतिक इम्यूनिटी बूस्टर
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135-140 दिन में तैयार होती है फसल
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35-38 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन
2. मधुराज-55:
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मधुमेह रोगियों के लिए उपयुक्त
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शर्करा की मात्रा कम
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130-135 दिन में तैयार होती है फसल
3. जिंक राइस-2:
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कुपोषण दूर करने में सहायक
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बच्चों को डायरिया से जल्दी उबरने में मदद
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130-135 दिन में तैयार होती है फसल
वैज्ञानिकों का दावा:
विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. अभिनव साव के अनुसार, “हमारे द्वारा विकसित जीरा फूल, दुबराज, बादशाह भोग जैसी प्रीमियम किस्मों की मांग देश-विदेश में बढ़ी है। जीआई टैग मिलने के बाद छत्तीसगढ़ के चावलों की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनी है।”

उत्पादन और उपलब्धता:
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सभी विशेष किस्मों की फसल 110-145 दिन में तैयार
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उत्पादन क्षमता 35-60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
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बाजार और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध

अन्य महत्वपूर्ण किस्में:
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छत्तीसगढ़ जिंक राइस-1: प्रोटीन, जिंक और आयरन से भरपूर
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बादशाहभोग सिलेक्शन-1: 140-145 दिन में तैयार होने वाली सुगंधित किस्म
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दुबराज सिलेक्शन-1: 2016 में विकसित प्रीमियम क्वालिटी चावल
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छत्तीसगढ़ संकर धान-2: अधिक उपज वाली संकर किस्म
भविष्य की संभावनाएं:
विश्वविद्यालय के अक्ति जैव विविधता संग्रहालय में धान की 23,250 किस्में संरक्षित हैं, जिन पर निरंतर शोध जारी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ये औषधीय चावल न सिर्फ स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान हैं, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायक सिद्ध हो रहे हैं।
