पुनर्लेखन—भूपेश बघेल की PMLA धारा 44 चुनौती पर समाचार
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल विशेष रूप से PMLA की धारा 44 (संशोधित जांच) को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रहे हैं। इस याचिका में वह यह तर्क रख रहे हैं कि ED (एन्फोर्समेंट डायरेक्टोरेट) के पास जो धाराएँ 44, 50 और 63 उन्हें अपर्याप्त न्यायिक निगरानी के साथ व्यापक अधिकार देती हैं, वे संवैधानिक तरीके से जाँच प्रक्रिया को अधोसंरचित कर रहीं हैं। इस मांग की पैरवी वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने की है। कोर्ट ने इस संवैधानिक चुनौती की सुनवाई 6 अगस्त 2025 के लिए सूचीबद्ध की है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख और आदेश
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4 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने पहली दो याचिकाएँ—जो तथाकथित ‘piecemeal’ जांच प्रक्रिया (जांच को खंडों में विभाजित कर आगे बढ़ाना) से जुड़ी थीं—को खारिज कर दिया और भूपेश व उनके पुत्र चैतन्य को उच्च न्यायालय जाने का निर्देश दिया।न्यायपालिका ने कहा कि ऐसी याचिकाएँ सीधे सुप्रीम कोर्ट में लाना अनुचित है और यह सिर्फ प्रभावशाली व्यक्तियों की प्रवृत्ति बन रही है — “सामान्य नागरिक कहाँ जाएँ?”, जैसे करारे शब्द न्यायालय ने कहे।
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हालांकि PMLA की धारा 50 और 63 के खिलाफ दायर संवैधानिक चुनौती (कहीं आत्म-बलात्कार और दस्तावेज़ की बाध्यता से जुड़ा प्रश्न) सुप्रीम कोर्ट जांच कर सकती है।
बघेल का पक्ष
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भूपेश बघेल ने मीडिया के सामने उक्त धाराओं को अनियंत्रित और लगातार जांच जारी रखने के साधन के रूप में आरोपित किया है। उन्होंने कहा कि एक बार चार्जशीट दाखिल हो जाए, उसके बाद आगे की जांच के लिए कोर्ट की मंजूरी अनिवार्य होनी चाहिए, लेकिन ED ने ऐसा कभी नहीं किया।साथ ही उन्होंने विचारण के बिना व बयान करवाने—उदाहरण के लिए धारा 50 में किसी व्यक्ति को कई बार सम्मनित करना—को न्याय प्रक्रिया के खिलाफ माना है।
विषय विवरण याचिका विषय PMLA धारा 44, 50, 63 के अधिकारों की संवैधानिक वैधता चुनौती पक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल (भूपेश बघेल के लिए) सुनवाई तिथि 6 अगस्त 2025 न्यायालय की टिप्पणी सामान्य लोग कहाँ जाएँ? न्यायालय निरूपित करना ज़रूरी अन्य याचिकाएँ ‘piecemeal probes’ संबंधी याचिकाएँ High Court में भेजी गईं
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