• 03 AUGUST 2020
  • City news -Chhattisgarh 

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सावन का अंतिम दिन

भगवान शिव का प्रिय माह सावन माह मेवाड़ी रीति से पूर्णिमा पर समाप्त हाेगा, वहीं वागड़ में गुजराती, महाराष्ट् की परम्परा के अनुसार 15 दिन पूर्ण हुए हैं। राजस्थान के डूंगरपुर से दाे किमी दूर उदयविलास पैलेस के आगे हजारेश्वर महादेव मंदिर है। इस मंदिर में विश्वेश्वर महादेव स्थापित हैं। मंदिर में ही दस इंच ऊंची वर्गाकार पीठिका बनी हुई है। इसके मध्य जलाधारी बनी हुई है। इस पर 121 एकादश रुद्र स्वरूप के रूप में विराजमान हैं। इसके चाराें काेने में रुप्रद पंचायतन देवताओं के यंत्र और बीजाक्षर उत्कीर्ण हैं। करीब 300 साल से पुराने इस मंदिर में वास्तु का नायाब उदाहरण है।

रक्षाबंधन की पूर्व संध्या पर रविवार काे पंजाब में सभी बाजार खुले और लाेगाें ने खूब खरीदारी की। लोग कोरोना का डर भूलकर बाजार पहुंचे। फोटो रैनक बाजार की है जिसमें एक बहन अपने भाई के लिए राखी पसंद कर रही है। मीना बाजार, अटारी बाजार और रैणक बाजार के दुकानदारों ने कहा कि प्रशासन अगर दो दिन पहले रविवार को बाजार खुलने के आदेश देता तो बेहतर हाेता। हर साल देहात से भी लोग खरीदारी करने आते हैं लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ।

सावन माह की पांचवीं सवारी शाम 4 बजे

महाकालेश्वर मंदिर में रक्षाबंधन के मौके पर कागज से फूलों से सजावट की गई। पं. यश गुरु के अनुसार पहली बार रंगीन कागजों का उपयोग कर यह कलात्मक सजावट कराई गई है। कलाकारों ने गर्भगृह से लेकर नंदीगृह तक रंगीन कागजों की कलाकृतियां बना कर यह सजावट की। सोमवार को भगवान महाकाल को भस्मआरती पुजारी श्रीकृष्ण पुजारी व महेश उस्ताद पुजारी परिवार की ओर से परिवार की महिलाओं द्वारा राखी बांधी जाएगी। 11 हजार लड्डुओं का महाभोग भी लगेगा। सावन माह की पांचवीं सवारी शाम 4 बजे निकाली जाएगी।

भगवा साफा पहनाकर भगवान का श्रृंगार

भगवान काशीविश्वनाथ ने रविवार को बरसते पानी के बीच नर्मदा में नौका विहार किया। दो नाव में 10 श्रद्धालु सवार थे। इससे पहले घाट पर भगवान के 11 किलो चांदी के मुखौटे का अभिषेक-पूजन किया गया। शाम करीब 5.30 बजे भगवान को मंदिर से काशीविश्वनाथ घाट लाया गया। यहां पूजन व अभिषेक के बाद भगवान को भगवा साफा पहनाकर शृंगार किया गया। कार्यक्रम में सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा ध्यान रखा गया। हर साल भगवान की शाही सवारी के तहत होने वाले नौका विहार में 10 नाव पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु सवार होते थे।

तांत्रिक विद्या सीखने आते थे यहां लोग

यह है 9वीं सदी का ऐतिहासिक मितावली मंदिर, जिसे चौसठ योगिनी मंदिर भी कहा जाता है। ऊंची पहाड़ी पर गोलाकार आकृति में बने इस मंदिर में 64 कमरे में हैं और हर कमरे में शिवलिंग के साथ चोगिनियां हैं। इसे तांत्रिकों का विश्वविद्यालय भी कहा जाता था, जहां पहले देशभर के लोग तांत्रिक विद्या सीखने आते थे।

श्रावण माह में हुई बारिश के ऊंची पहाड़ी पर छाई हरियाली व आसपास स्थित खेतों में बिछी हरीतिमा इन दिनों इसकी सुंदरता और बढ़ा रही है। यूं तो अक्सर यहां पर्यटक आते रहते हैं लेकिन सोमवार के दिन यहां आसपास के लोग भी पूजा-अर्चना के लिए काफी तादाद में पहुंचते है

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