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छत्तीसगढ़ के पारंपरिक पर्वों में से एक पर्व कमरछठ इस बार आज 9 अगस्त रविवार को मनाया जा रहा है । इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र एवं सुख-समृद्धि के लिए हलषष्ठी माता की पूजा-अर्चना करेंगी। अन्य प्रदेशों में हलषष्ठी पर्व को भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलदाऊ के जन्मोत्सव के रूप में मनाने की परंपरा है।

छत्तीसगढ मे षष्ठी, छठ माता की पूजा-अर्चना में पसहर चावल और छह प्रकार की भाजियों का भोग लगाया जाता है। चूंकि कोरोना महामारी के चलते प्रदेश के अनेक जिलों में लॉकडाउन लगा हुआ था , और बाजार बंद था  मात्र दो दिनों से कुछ घंटे मार्केट खोलने की इजाजत दी गई है , इसलिए शनिवार को पसहर चावल खरीदने के लिए गोलबाजार, शास्त्री बाजार और बीरगांव  में महिलाओं की भीड़ उमड़ पड़ी।

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छत्तीसगढ़ के पारंपरिक पर्वों में से एक पर्व कमरछठ रविवार को मनाया जाएगा। माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र एवं सुख समृद्घि के लिए हलषष्ठी माता की पूजा करेंगी, छठ माता की पूजा में पसहर चावल और छह प्रकार की भाजियों का भोग लगाया जाता है, इसमें अन्य पूजन सामग्रियों का भी महत्व है जैसे – फूल, नारियल, फुलोरी, महुआ, दोना, टोकनी, लाई, छह प्रकार की भाजी का भी पूजा में महत्व है।

वही ब्राह्मणों के अनुसार भादो महीने के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ था और उनका प्रमुख शस्त्र हल था। इसलिए इस दिन को हलषष्ठी कहा जाता है। यह दिन माताओं के लिए बहुत ही खास होता है क्योंकि इस दिन संतान की लंबी उम्र के लिए मां निर्जला व्रत रखती हैं।

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पंडित राजेश उपाध्याय ने बताया भगवान बलराम का प्रधान शस्त्र हल तथा मूसल है। हल धारण करने के कारण भी बलरामजी को हलदार नाम से भी जाना जाता है। भगवान बलराम माता देवकी और वासुदेव की सातवीं संतान हैं।

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यह पर्व श्रावण पूर्णिमा के छह दिन बाद विभिन्न नामों के साथ इसे चंद्रषष्ठी बलदेव छठ,  हलषष्ठी भी कहते हैं। इस दिन महिलाएं संतान प्राप्ति अथवा संतान की रक्षा के लिए व्रत रखती हैं। षष्ठी का पर्व 9 अगस्त को सुबह 4 बजकर 18 मिनट से प्रारंभ होकर 10 अगस्त की सुबह 6 बजकर 42 मिनट तक रहेगी।

100 से 150 किलो रुपये किलो बिका पसहर चावल

पूजा में पसहर चावल का भोग लगाने की मान्यता के चलते चावल शनिवार को महंगे दामों में बिका। अलग-अलग जगहों पर महिलाओं ने 100 से 150 रुपये किलो में चावल खरीदा। जय स्तंभ चौक, सदर मार्ग व बीरगांव के मुख्य बाजार और इलाके के  सड़क किनारे की दुकानों पर आम दिनों की अपेक्षा चावल दोगुनी तिगुनी कीमत में बेचा गया।

पसहर चावल को खेतों में उगाया नहीं जाता। यह चावल बिना हल जोते अपने आप खेतों की मेड़, तालाब, पोखर या अन्य जगहों पर उगता है। भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलदाऊ के जन्मोत्सव वाले दिन हलषष्ठी मनाए जाने के कारण बलदाऊ के शस्त्र हल को महत्व देने के लिए बिना हल चलाए उगने वाले पसहर चावल का पूजा में इस्तेमाल किया जाता है। पूजा के दौरान महिलाएं पसहर चावल को पकाकर भोग लगाती हैं, साथ ही इसी चावल का सेवन कर व्रत तोड़ती हैं।

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